Wednesday, November 3, 2010

दरख्त सूखते नहीं...

दरख्त यूं सुखते नहीं...
दरख्त कभी सूखते नहीं
अगर उनको मिल जाती थोड़ी तसल्ली 
इस बात की...
कि अगर वो न रहे तो...
ज़मीन पर ज़िंदगी
सिकुड़ती चली जाएगी...
गर वो न रहे तो
नीड़ की जगह
बेहिस और रूखी इमारतों में होगी 
और गुरूर से तनी इमारतों में...
कभी ज़िंदगी नहीं पनपती...
दरख्त कभी सूखते नहीं...
गर बता देते उन्हें उनके होने की अहमियत...
गर वो न देखते उनके ऊपर तनती कुल्हाड़ियां
मैने सुना वो दरख्त टूटता हुआ
ये कहता रहा...
अब क्या रखा है इस जहां में...
जब एक इंसान नहीं पूरे मकां में...

रोटी...

रोटी...
जुगाड़ बन गई है                            
रोटी खिलवाड़ बन गई है
हड्डी के ढांचों पर राजनीति
अक्सर रोटी सेकती है...
तमाम दधिचियों की आहूति से...
हर रोज़ राजनीति चमकती है...
हर रोज़ किसी न्यूज़ चैनल पर...
इनकी खबरें वेश्या सी मचलती हैं...
सुनो अगर हो सके तो कान मत दो
मुल्ला, मस्जिदों में अज़ान मत दो
मंदिरों की घंटियों उतार फेंकों...
क्योंकि हर तरफ अस्थि पंजर फैले है...
शुभता का कहीं भी संकेत नहीं...
राजनीति में हर चेहरे

Wednesday, August 11, 2010

सोच को लगाम...

प्रिय मित्र,
माफ किजिएगा आज से सोचना बंद कर रहा हूं। ये एहद है जो उठा रहा हूं। सोचा कि आखिर सोच कर उखाड़ क्या लूंगा। और जो सोचते थे उन्होने क्या उखाड़ लिया। सोचने समझने विचारने और उसको उतारने के लिए बड़े लोग बैठे हैं कांपते हुए सिंहासन पर जिनके पेट में अक्सर हौल उठती है अगर कोई और सोचता है या करता है। तो भईया सोचा कि क्यों उनकी पेट की हौल को बढ़ाकर अल्सर में कन्वर्ट किया जाए। वैसे सोचने के दायरे इनके पास कई तरह के होते हैं। ये दायरे कई पैरामीटर  के आधार पर बनते हैं। आलोचनाओं से ये सोचने वाले, कांपते सिंहासन पर बैठे इंद्र हड़कते हैं। खैर...तमाम तजुर्बों के मद्देनज़र इस फैसले पर पहुंचा कि सोचने इन्ही को दिया जाए। अपन मस्त रहें।

मेरे बाबा के ज़माने में कई प्रकार के लोग घर पर आते थे। चूंकि बाबा बनारस के जानेमाने ज्योतिषी थे लिहाज़ा लोग उनके पास तरह-तरह की समस्याएं लेकर आते और मैं बाबा के साथ बैठक में बैठकर बाबा की ज्योतिषीय गणित की खट-खट उनके स्लेट पर सुनता। मुझे लोगों की समस्याओं में न रूचि न उनको समझने के अक्ल हां जो मुझे अच्छा लगता था वो बाबा के स्लेट से निकलती खट-खट थी। बाबा की स्लेट मुझसे बड़ी थी और खासी चिकनी। मैं जब पूछता  कि बाबा मेरी स्लेट ऐसी क्यों नहीं है तो वो कहते जितना पढ़ोगे लिखोगे उतनी चिकनी स्लेट होती जाएगी। सो उसपर ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं हां चित्रकारी खूब की। और कोशिश यही रही कि खट-खट की आवाज़ ज़िंदा रहे। इसके लिए भी खूब सोचा था मैंने कि आखिर जुगाड़ क्या हो कि पढ़ाई भी न करनी पड़े और स्लेट चिकनी भी हो जाए।

हां तो मैं बता रहा था कि बाबा के ज़माने में कई तरह के लोग (अलग-अलग डिज़ाइन वाले), घर पर आते रहते थे। उनमें एक थे फेंकू राम। फेंकूराम बेसिकली एक छोटा से प्रेस चलाते थे और बाबा का पंचाग उसी प्रेस से निकलता था। फेंकू जी छोटे कद के सिमटे हुए बड़े आदमी थे। कुर्ता-धोती मुंह एक तरफ पान के बीड़े से फूला हुआ और काले फ्रेम वाला चश्मा और मोटे ग्लास के पास से झांकती उनकी एक्स्ट्रा बिग आंखें। उनकी आवाज़ में बेस भी था और नाक का असर भी। उनकी सिकड़ी खटखटाने की आवाज़ (मेरे घर के मोटे दरवाज़े में दो खट-खटाने वाने गोल सिकड़ी लगी हुई है।) खास थी शायद उनकी आवाज़ से मिलती जुलती या उनकी पर्सनालिटी से, ज़ोर-ज़ोर से पर छोटे-छोटे कई खंडो में वो खड़खड़ाते थे। मैं सन्न से दौड़ पड़ता फेंकू आए...फेंकू आए करके।

दरवाज़े को खोलते ही फेंकू राम जैसे गदगद हो जाते लगता कि उनकी आंखे इस बात को सोचकर आश्वस्त हो जातीं कि कम से कम मैं उनसे छोटा ही हूं। पान का लाल रंग चढ़े दांत दिखाते पूछते "पंडित जी हउवन?"  मुझे फेंकूराम किसी दूसरी दुनिया से आए बहुत ही प्यारे कैरेक्टर लगते थे। छोटा सा चेहरा सलीके से कढ़े हुए तेल लगे बाल। होठों पर पान का रंग और काले-लाल-सफेद दांत। और हां पैरों में पंप शू, कंधे पर लाल रंग का गमछा। लेकीन इस सब के अलावा एक खास बात और भी थी वो थी उनके पेशानी पर उभरी हुई तीन-चार लकीरें। ये मेरे लिए सवाल थीं कि आखिर इनके चेहरे पर ये लाइनें कहां से आईं। बाबा से पूछ लिया एक दिन तो उन्होने बताया कि फेकू राम ज्यादा सोचते हैं। ज्यादा सोचना नहीं चाहिए बल्कि करने में यकीन करना चाहिए। तब बालमन ने ये एहद उठाई थी कि ज्यादा सोचूंगा नहीं बल्कि करुंगा। पर वक्त ने अपनी तमाम परतों में इस अहद को दबा दिया था।

फेंकूराम जब भी घर आते मैं उनको बैठक में बैठाता और दौड़ कर बाबा को खबर करता। बाबा को मेरा बड़ों जैसे ज़िम्मेदारियां उठाना किसी मनोरंजन से कम नहीं लगता और मुझे बाबा के साथ बैठक में बैठकर फेंकूराम को निहारना। बाबा के न रहने के बाद फेंकूराम का आना भी धीरे-धीरे कम हो गया। कभी-कभार बाबूजी से मिलने आए फिर न जाने कहां गुम हो गए। ऐसे ही कई कैरेक्टर थे, जो न जाने क्यों याद आते हैं जिन्हे बाहर की दुनिया के इंट्रोडक्शन के दौरान देखा। जो किसी काल्पनिक दुनिया के पात्र थे।

उस वक्त जब खुले आंगन में गर्मी के दिनों में हल्के ठंडे बिस्तर  पर सोते हुए अंधेरे आसमान में टंके सितारों को देखता तब भी सोचता था आखिर क्या है ये सब, कितना है सब...कहां तक है सब....सारे चेहरे जो दिनभर मिलते वो घूमते ज़ेहन में फिर नींद आकर न जाने कहां ले जाती उन्हे। मेरे सवालों के जवाब बाबा से लेकर बाबूजी, भईया और जीजी, दादी और अम्मा तक सबके पास होती। सरल जवाब जो एकबार में समझ आ जाता था। पर अब न जाने क्या हो गया है सवालों के जवाब नहीं मिलते। मिलते हैं तो उलझे। रिश्ते भी अब कितने पेचीदा हो गए हैं अचानक। सोचना तब भी चलता था आज भी चलता है, आप ही बताइए जो आदत बचपन की हो वो भला कैसे छूट सकती है।

तो साहब मन नहीं मानता फिर सोचने लग जाता हूं कि रोटी ने कितना मजबूर कर दिया है। अब अपने शहर की हरारत महसूस नहीं होती। घर लौटता हूं तो लगता है मेरा शहर मुझे बुझी आंखों से टटोल कर पहचानने की कोशिश कर रहा है। पर वहां रह भी नहीं पाता क्योंकि सपनों की दुनिया से आनेवाले सारे कैरेक्टर धुआं हो चुके हैं। मेरे शहर के हर मोड़ में इतना पैनापन आ चुका है कि थोड़ा सा चूके तो सीधे ज़ख्मी होने का ख़तरा है।

खैर...देखिए बातों बातों में इतना सोच गए। चलिए इस सोच को यहीं लगाम लगाता हूं। भूल-चूक लेनी-देनी। हां इतना आश्वस्त ज़रूर करना चाहूंगा कि ये सोच किसी सिंहासन पर कब्ज़ा करने के लिए नहीं है इसलिए पेट में हौल मचाने की ज़रूरत नहीं है।

आपका
राकेश

Saturday, August 7, 2010

'लाउड होता बनारस'

बउराना दोनों ओर है। एक उनमें जो बनारस को छोड़कर किसी मेट्रो में प्रवासी की भूमिका में है और बनारस का नाम आते ही या फिर बनारस में पैर रखते ही उह-आह-आउचनुमा सोफीस्टिकेटड टाइप शब्द उगलते हैं। दूसरे वो जो बनारस में रहकर ही बनारस की छाती पर मूंग दल रहे हैं। एक बाहर से बनारस के न बदलने पर नाक भौं सिकोड़ता है, कब्जियत का चेहरा बनाता है दूसरा अंदर ही अंदर बनारस को खलिया रहा है। जिसके लिए बनारस की संस्कृति, बनारस की कला, बनारस की धरोहर, बनारस का संगीत सब बिकाऊ है। साहब बाज़ार का विरोध नहीं है पर ये तो ज़रूर निश्चित होना चाहिए न, कि कितना बाज़ार। आप कह सकते हैं कि अगर संजोएगा तभी तो बेचेगा। लेकिन आप ज़रा लंबे अरसे के लिए बनारस में रुकिए आपको पता चल जाएगा संजोना उतना ही हो रहा है जितना बिके, संजोना बस ऊपर-ऊपर ही से है। दरअसल अंदर से, भीतर से बड़ा ही खतरनाक खेल चल रहा है। कहीं ऐसा न हो कि आप ऊपर ही ऊपर चमक में फंसे रह जाएं, या अटके रह जाएं और जब आप बनारस को समझने के लिए इसे स्पर्श करें तो ये भरभरा कर गिर जाए।


एक लंबे अरसे के बाद बनारस गया अपने बनारस में। पर न जाने क्यूं ये बनारस बूढ़ा थका हुआ, अपनों से उपेक्षित घर के किसी अंधेरे कमरे में चुपचाप मटमैले बिस्तर पर टिका बुज़ुर्ग महसूस हुआ। लगा कि उसे ऐसा बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। बनारसी फक्कड़पन की संस्कृति भी कितनी सोफिस्टिकेटेड और प्रेंज़ेटेबल हो गई है। फक्कड़पने में भी सलीका रखा जा रहा है।

मुझे शिकायत बदलाव से नहीं है। पर बदलाव सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए हो रहा है ये बदलाव ज्य़ादा और ज्यादा कमाने के इरादे से घर के चूल्हे, बर्तन और यहां तक की अपनों को बेचने जैसा लग रहा है। पहले गंगा की आरती होती थी जब तो घंटा घड़ियाल की आवाज़ें कहीं अंतस को छूती थीं। उन्हे लाउडस्पीकर के ज़रिए लाउड नहीं किया जाता था अब तो सब लाउड ही लाउड है। बनारस की पूरी ज़िंदगी इसी लाउडपने में समा गई है। पूरी फक्कड़ संस्कृति को खींच कर इतना नाटकीय और लाउड इन बनारस के लालों ने कर दिया है कि खरीदने वालों और तमाशा देखने वालों की भीड़ तो लग रही है पर खरीद कर ले जा रहे हैं संस्कृति की भस्म।

त्यौहार वैसे तो हर शहर में मनाए जाते हैं फिर वो हिंदुओं के हों या मुसलमानों के या फिर किसी और धर्म के खुशी और रंगत हर जगह दिखती है। पर मैं बेतक्कल्लुफ होकर ये फरमाउंगा कि अब वो रंगत यकीन मानिए बनारस के किसी त्योहार में नहीं है। अब भीड़ नज़र आती है त्योहारों के मौकों पर...लेकिन भीड़ मस्त कम बदहवास ज्यादा दिखती है। अपने तरह से, अपने हिसाब से फूहड़पन के नए नए पैरमीटर सेट किए जाते हैं मजाल है कि आप बोल दें...बस यही समझिए कि “सटला त गईला बेटा।” और अगर आपके साथ कोई हादसा नहीं हुआ तो भी कोई गुटखा मुंह में घुलाए...भोकर देगा...यही त हौ बनारस।

(शेष आगे...)

Tuesday, August 3, 2010

बनारस चर्चा...

बनारस की बात पिछले अंक में हुई थी। बनारस ज़ुकाम की तरह मुझे लंबे अरसे से परेशान कर रहा है हांलाकि ज़ुकाम के हल्के सुरूर का मज़ा ले रहा हूं। कल सपने में देख रहा था अपना शहर और उसकी भीगी-भीगी सुबह। भीगी-भीगी सुबह इसलिए क्योंकि सुबह के वक्त यहां कि लगभग हर संकरी गली पानी से तर-बतर होती है। सरकारी ‘कल’ (हमारे यहां नल को कल बोलते हैं) तो अब कम ही बचे हैं लेकिन प्राइवेट कलों की और टुल्लु की संख्या बढ़ गई है लिहाज़ा घर के बाहर जुगाड़ के पाइप से हर्रउल पानी आता है और उसको बज़रिए टुल्लू पंप घर में पहुंचाया जाता है।

सबेरे के वक्त सुंघनी या गुल दांतो पर रगड़ते, संकरी गलियों में चबूतरे पर या फिर घर की ड्योढ़ी पर बैठे...बतकुच्चन करते लोग तेज़ी से आंखों के सामने घूमते चले गए। पानी यहां से वहां तक फैल जाता है। डालडा के दस किलोइया डब्बे से लेकर बड़े-बड़े गैलनों में पानी भरा जाता है। पानी पर से बहस शुरू होती है और उसे घसीटते-घसीटते ईरान की गैस पाइप लाइन और अमेरिका के चुनाव से लेकर क्लिंटन की बेटी चेल्सिया की शादी और फिर उपनिषदों के गूढ़ अर्थों की लंठईकृत व्याख्या कर बकचोदी खत्म होती है।

मेरे कुछ मित्र हैं जो अब बनारसी नहीं रहे, दरअसल मेट्रो के ठिठुराकर अकड़ पैदा कर देनेवाले संक्रमण ने इतना चउचक असर डाला कि बनारस में लोगों के हाथ फेंक कर चलने से उन्हे एलर्जी होने लग गई। जिस बनारस ने उन्हें ज़िंदगी की पेचीदा गलियों से निकलने की न जाने कितनी बार बेहद मस्त अंदाज़ में तरकीब सिखाई अब वही बनारस उनके लिए अप्रासंगिक है। उसकी उलझी और संकरी गलियों को देखकर, उसमें घुसनेपर उन्हे ‘बुल शिट’ याद आता है। कोसना भी ऐसा होता है जैसे कोई उत्तरआधुनिक पुत्र अपने पिता को कोस रहा हो। बस चले और अगर बनारस कोई ज़िंदा शख्स हो तो ये सचमुच उसे किसी ‘ओल्ड एज होमनुमा’ जगह पर डाल दें। चूंकि मैं लिख रहा हूं और इसे आप जैसे भद्रजन पढ़ रहे हैं लिहाज़ा लिखने की मर्यादा का निर्वहन करना है वरना मेरे पास ‘बनारसी रूद्री’ का खज़ाना ऐसे लोगों के लिए है। उस ‘रूद्री’ पर विस्तार से लिखूंगा फिर कभी।

हां तो छोड़िए ऐसे...वालों को। मैं कह रहा था बनारस याद आ रहा है। और बेइंतहा, न जाने क्यूं ऐसा लगता है बूढ़े बनारस को जवान बनाने की कोशिश चल रही है। डेंट पेंट चल रहा है हर तरफ, बिना उससे पूछे कि “बुढ़उ मजा आवत हौ रंगीन भईले में।“

दरअसल बनारस के दोनों टाइप के लौंडे जो सत्तर के दशक उत्तरार्द्ध, अस्सी और नब्बे के दशक में पैदा हुए उसे दक्खिन लगाने पर तुले हुए हैं और यकीन मानिए बउरहट के हद तक।
 
(इन दो टाइप के लोगों के बारे में अगले अंक में...)

Monday, August 2, 2010

यूं ही कुछ...

मुझे तरक़ीब लगाने दो कुछ                            
अब जाकर ठहरा हूं मैं किनारे पर

तुम्हें डूबने न दूंगा दरिया में इस तरह
लहरें जम जाएंगी मेरे इक इशारे पर

कहता है तूफान उठाएगा वो जहां के लिए
मुझे तरस आने लगी है उस दीवाने पर

वो इक भूखे आदमी की लाश थी
हुक्मरानों की कतार थी उसके दरवाज़े पर

'राकेश'






Wednesday, July 14, 2010

बाज़ार में बनारस

मेरा शहर है बनारस,  जब आप कभी यहां आएंगे तो हो सकता है कि इसकी गुनगुनी तासीर में एक एक लम्स मेरा भी मिल जाए। खैर... बचपन में जब आप पिता जी की अंगुलियों को पकड़कर किसी शहर को बस और बस खुद के नज़रिए से देखने के लिए निकलते हैं तो कितना नया लगता है सब वैसा ही मुझे भी लगता था। कबीर चौरा चौराहे पर सोमनाथ चचा की पान की दुकान। जिसपर ब्रास की चद्दर चढ़ी चौकी पर लाल रंग के कपड़े में भीगे हुए पान लिपटे रखे रहते थे। शाम के वक्त बाबूजी के साथ उस दुकान तक पहुंचना मेरे लिए लंबा सफर था जो पहले पैदल फिर उनकी गोद में बैठकर पूरा होता था और  रोचक होता था। अब ये सफ़र   बहुत छोटा है बमुश्किल पांच से सात मिनट का पैदल...उबाऊ नहीं कहुंगा क्योंकि इतने कम वक्त में आप ऊब भी नहीं सकते।

उनकी दुकान पर पहुंच कर मैं उस दुकान के पूरे कैरेक्टर को खामोश निगाहों से खोजता...सोमनाथ तो मिलते ही...उनके भाई मदन और उनकी मां...जिन्हे मैं देखता डरने के लिए था। मुझे सोमनाथ चचा कतई पसंद नहीं थे...अक्सर अकड़ में रहते हां पहुंचने पर ये उसी भावभंगिमा के साथ ये ज़रूर बोलते 'गुरूजी पालगी' और खिस्स से हंस देते वो और वहां खड़े सभी। मेरी मुट्ठियां बाबूजी के उंगली के इर्द-गिर्द और भिंच जाती। क्योंकि मुझे सबका अटेंशन पाने से परेशानी होती।

एक छोटा मीठे पान का बीड़ा मेरे लिए भी होता था कभी-कभी। जिसे सोमनाथ चचा चुपचाप मेरे तक बढ़ा देते और मैं बाबूजी की तरफ सर उठाकर देखता और फिर सहमति मिलते ही उसी स्टाइल से दबा भी लेता। मेरी कोशिश ये होती थी कि जल्द से जल्द यहां से निकला जाए कहीं सोमनाथ चचा की मां न आ जाएं...पर किस्मत अक्सर खराब ही होती थी। वो कभी दुकान के अंदर से या फिर बाहर से चिल्लाते हुए आ ही जाती थीं। सफेद मटमैली धोती...वैसे ही बाल और चेहरे पर दुनिया भर से चिढ़े हुए भाव...और मुंह में गालियां। वो मुझे किसी कहानी की बुढ़िया जादूगरनी लगती थीं। गुस्सा हांलाकि उनके नाक पर होता था लेकिन मुझसे स्नेह था...सोमनाथ चचा से पूछतीं कि बच्चा के पान खिउवले...?

कबीर चौरा दरअसल बनारस का क्लासिकल इलाका है। बनारस का 'दर्शन' अगर घाटों पर है तो 'शास्त्रीय बनारस' कबीर चौरा पर। शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना, कबीर चउरा से नागरी नाटक मंडली के बीच सड़क उस पार बसा है। पं कंठे महराज, उसके बाद गुदई महाराज, किशन महाराज, राजन-साजन मिश्र, बिरजू महाराज सब एक ज़माने में कबीर चौरा चौराहे से लेकर पिपलानी कटरा तक झूलते थे। गोपी की दुकान पर कचौड़ी सरियाते और भईया लाल की दुकान पर चाय के साथ गप-सड़ाका लगाते थे।

मेरे बचपन में कबीर चौरा चौराहा और पिपलानी कटरा के बीच (जो एक किमी से भी कम क्षेत्र है) कम से कम चार किताबों की दुकानें थीं। यहां कोर्स की किताबों के अलावा स्टेशनरी मिला करती थी। इसके अलावा एक पत्र-पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी। आज इस इलाके में एक भी किताबों की दुकान नहीं। इसका मतलब ये कतई नहीं कि दुकानें नहीं रहीं दुकाने तो पहले से ज्यादा हैं लेकिन कुछ में इंटरनेट कैफे है...और कहीं तो ठंडी बियर की दुकान तक खुल गई है। कांबिनेशन देखिए एक मंदिर है हनुमान जी का और उसके बगल में है ठंडी बियर की दुकान।

बनारस एक समय में मोक्ष की नगरी थी। पर माफ किजिएगा अब नहीं है। पहले यहां की फिज़ां में भांग की मस्ती होती थी। अब दारू की दुर्गंध है। सड़क के मकान दुकानों में तब्दील हो गए हैं। गली के मकान कटरों में। मंदिरों के चारदिवारियों को भी दुकानों में बदल दिया गया है। और मंदिर तो दुकान हैं ही। एक अजीब सा घालमेल चल रहा है। ये उन्ही लोगों की साज़िश है जो बनारस के हैं और बनारस को ज़िंदा नहीं रखना चाहते। विकास बाज़ार का हो रहा है, बनारस का नहीं।

ये बाज़ार बनारस में किसी कैंसर की तरह पनप रहे हैं। बनारस की धमनियों रक्त रूक-रूक के दौड़ता है आजकल। यही वजह है कि जब आप बनारस आते हैं तो घुटते शहर को देखकर आपको भी अफनाहट हो सकती है। सड़के जाम है, गलियां की बजबजाती रहती हैं भीड़ से, दुकानों से और ओवर फ्लो होते सीवर से।

जानेमाने लेखक और समीक्षक काशी नाथ सिंह जी ने 'काशी की अस्सी' में जिस काशी का ज़िक्र किया है जिन कैरेक्टर्स को खींचा है उनमें से आज एक भी बनारस में ज़िंदा नहीं। पहले वो कैरेक्टर बनारस की हर चाय की दुकान, पान की दुकान पर या फिर गलियों में नज़र आते थे। अब लोग भांग का कर बौराते नहीं है दारू पीकर नालियों में लुढ़कते हैं और मक्खियों से लिपटे पाए जाते हैं। होश आने पर नज़रें शर्म से झुकती नहीं बल्कि उजड्डों की तरह घूरती निकल जाती हैं।

उजड्ड लफंगों की टोली बनारसी मस्ती के नाम पर नंगा नाच करती है हाथों में दारू की बोतल और मुंह में चिकन की टुकड़ा दबाए। ये टोली हर त्योहार में पाशविक हो उठती है। बनारस को बेचती ऐसी कई टोलियां आपको जाने पहचाने इलाकों में मिलेंगी...ये नए बनारस के  'बाज़ार संस्कृति' की संकर औलादें हैं जो बनारस को बुझाने और इसकी तासीर बर्बाद करने का षडयंत्र रच रही हैं। इन्हे देखकर लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब बनारस किसी बाज़ार में बिकता नज़र आएगा...या फिर तेज़ी से बनते बाज़ार के ब्लैक होल में समा जाएगा।

Monday, July 5, 2010

मेरे हिस्से की बारिश

बहुत दिनों से खाली था
आसमान
ठहरती नहीं थीं निगाहें
आसमान में...
कसैली धूप लावा बन बरसती थी
लेकिन अब बारिश आई है
आखिर हर चीज़ की इंतहां होती है
यहां से वहां तक हर सू
बादलों का कब्ज़ा है...
दमकती बिजली है
मदमस्त मेघ गा रहे हैं...
बच्चे कागज की नाव बना, मचलते जा रहे हैं
मैं हाथ बढ़ा बारिश की नन्ही बूंदो को छूता हूं
ये मेरे हाथों से फिसल जाती हैं
जैसे रिश्ता ही नहीं था कभी, ऐसे निकल जाती हैं...