Sunday, November 16, 2014

सफाई की 'अलख'


बलेसर सुरियाए चले आए हैं। सफाई अभियान की तैयारी है। त्रिभुवन बाबू झक्क सफेद कुर्ता अउर बंडी सिलवाए हैं। उनके नाती एकेश्वर एक सफेद टीशर्ट जिसपर "लेट्स डू इट" लिखा है पहिन के अंग्रेजी में दांत निपोर रहे हैं। बिंदेश्वरी पाणे थोड़ी देर से आए हैं। बाबू साहब ने पूछा - "का बिंदेश्वरी देर कइसे भई....?" अरे सुबह मैदान फिरने गया था तो लोटा उहैं छूट गया उसे ही खोजने में देरी हो गई।- बिंदेश्वरी पाणे ने जवाब दिया...।
कुल मिलाकर चहल पहल बढ़ गई है। सफाई का स्थान भी निश्चित कर लिया गया है। बरुना घाट की सफाई होगी। ल लोटा घाट कि काहें...गांव की क्यों नहीं?..."अरे नहीं गांव में सफाई शुरु की तो धूरै-धूर हो जाएगा। पक्का जमीन थोड़ै है।" - किसी ने जवाब दिया। - "संझा हो जाएगी पर गांव सफा नहीं होगा।"
अरे ए हो...अ मीडिया प्रेस-कैमरा उसको बोलाया कि नहीं। अरे हां एकी बोल दिए हैं भाई। एकी कौन? अरे बकलोल, एकेश्वर बंबई में जाकर एकी हो गए हैं। अचानक सनसनी फैलती है। बलेसर को त्रिभुवन बाबू ने बुलाया है। झाड़ू नहीं दिख रही। अरे झाड़ू कहां है बलेसर? बलेसर ने कहा गरीब गुप्ता को बोला है। गरीब गुप्ता की दुकान बंद है। ले लोटा...। हो गई गड़बड़। गरीब गुप्ता कल रात ही अपनी सुसराल साले की शादी में निकल लिए। अब झाड़ू के बिना राधा कइसे नाचेगी?
त्रिभुवन बाबू तांडव कर रहे हैं- " बलेसरा तुमसे कोई काम नहीं हो सकता।"
बलेसर सुन्न पड़ गए हैं...गांव में सन्नाटे सी फैलती सनसनी छा गई है। मीडिया अब कि तब पहुंचनेवाला है। सफाई होगी कैसे? झाड़ू संकट बड़ा है। किसी ने कहा घर की झाड़ू निकाल लो...। महिलाएं लामबंद हो गईं- "खबरदार! झाड़ू खराब हो जाएगी।"
बिंदेश्वरी पाणे ने संकटग्रस्त माहौल में आइडिया फेंका है- " बाबू साहब एक काहे न अलख भर जगा दी जाए?"
अलख भर माने?
माने ये कि सांकेतिक सफाई
ये क्या है भाई...?
अरे वो ये कि कुछ पत्ता-पत्ती घाट पर डाल दी जाए और फिर उसको हाथों से चुन-चुन के कचरा के डब्बा में फेंक दिया जाए...।
वो मारा! क्या आइडिया है।
पत्ता-पत्ती बटोरो रे एकेश्वरा...।
बाबू साहब के नाती एकेश्वर युवा ब्रिगेड के साथ पत्ता खोजने में लग चुके हैं।
चिंघाड़ के कहते हैं...." हे डूड लेट्स बटोरो पत्ता..." खलीहर युवाओं की टोली एकेश्वर के साथ हो लेती है।
सफाई अभियान की "अलख" जग गई है। दूर पगडंडी पर मीडिया की गाड़ियां धूल उड़ाते आगे बढ़ रही हैं। बाबू त्रिभुवन सिंह सदरी झाड़ रहे हैं, घर से शीशा मंगवाया है। पंडित जी मुंह में गुलाए पान की पीक ज़मीन पर फेंक, सुबह निवृत्त करवाने वाले लोटे से कुल्ला कर रहे हैं।

Sunday, August 10, 2014

'ज़मीर' का स्टॉक


तिवारी जी पत्रकार हैं। करीब दो दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं। सेना में जाने की योजना थी वैसी ही कद काठी के, और वैसे ही सक्रीय लेकिन आ गिरे पत्रकारिता में। बात करते हैं तो लगता है बटालियन को कमांड ही दे रहे हैं। मुझे उनका सानिध्य अक्सरहां प्राप्त होता है। वो आह्लादित होते हैं या नहीं मैं ज़रूर होता रहता हूं। हमारे बीच हांलाकि कुछ कॉमन नहीं। वो ज्यादा बालते है, मैं नहीं बोलता। वो ठठा के हंसते हैं मैं बमुश्किल खिखिया पाता हूं। वो सक्रीय हैं मैं अलहदी नंबर एक हूं। फिर भी हममें कुछ कॉमन भी है। जैसे हम दोनों ने कल्याण सिंह के शासन की परीक्षा देखी है। (यूपी के लोग समझ पाएंगे, उस वक्त नकल अध्यादेश लागू था पकड़े गए तो जेल, लिहाज़ा परीक्षा टाइट हुई थी और रिज़ल्ट भी टाइटै आया था।) और मेरी नज़र भी एक समय में सेना के कमीशंड ऑफिसर की पोस्ट पर थी। हां इस सबसे ऊपर एक और चीज़ कॉमन है वो है 'जमीर'। हम दोनों को ही ज़मीर अज़ीज़ है।
मुझे याद है जब गिरधारी की चाय की दुकान पर यूं ही तिवारी जी टकराए थे तो उन्होने कहा था, दोस्त तुम्हारी आवाज़ में सच्चाई है और तुम्हारी आंखों में ज़मीर की चमक है। इसे बचाकर रखना। आवाज़ में सच्चाई, आंखों में ज़मीर की चमक? वाह जी, मैं, मैं न हुआ भारत कुमार हो गया, या नाना पाटेकर। खैर तिवारी जी ने बड़ी ज़िम्मेदारी सौंप दी। ज़मीर बचा कर रखने की। मैंने 'जमीर' बचाना शुरू कर दिया। मैने उसके खर्च पर पहले लगाम लगाई। ज्यादा 'जमीर' खर्च होगा तो दिक्कत हो जाएगी। अब साहब 'जमीर' बढ़ने लगा। ये मेरा शगल बन गया। 'जमीर' को संभालना, सहेजना, बचाना।
कुछ दूसरे लोगों को भी पता चला कि मैं ज़मीर रखता हूं तो वो भी आए दरख्वास्त लेकर कि उनका भी रख लिया जाए। जितना भी है उन्हे बड़ा परेशान करता है। इसमें ज्यादातर लोग पत्रकार थे। एक दिन एक भाई साहब आए, बोले- बड़ा परेशान हूं 'जमीर' ने काम खराब कर रखा है जहां था दस साल बाद भी वहीं हूं, उसी तनख्वाह पर। मैने कहा तो आपको बॉस से बात करनी चाहिए। वो बोले- बात तो करूं पर वो है बड़ा बदमिज़ाज़ कुछ भी बोल देता है और फिर 'जमीर' आगे आ जाता है। सुना है आप रखते हैं ज़मीर। मेरी भी रख लीजिए, बड़ी कृपा होगी, देखिए मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं।
मैं आज तक समझ नहीं सका की आखिर 'जमीर' मुसीबत है या संपत्ति। खैर, मैं 'जमीर' सहेज रहा था, नौकरी कर रहा था। लेकिन अब एक दिक्कत होने लगी थी। दो कमरे के सेट में 'जमीर' का स्टॉक ज्यादा होता जा रहा था। पत्नी अक्सर खीझ उठती। एक रात मैने सपना देखा कि मेरे घर पर इन्कम टैक्स की रेड पड़ गई है। आईटी वाले लाट का लाट ज़मीर निकाले जा रहे हैं। पुलिस हथकड़ी चमका रही है। और अधिकारी मुझपर चढ़े जा रहे हैं, आय से अधिक संपत्ति हांए.....क्यों बे टुच्चे से प्रोड्यूसर, अबे कैसे जुटा लिया तूने इतना ज़मीर?
मैं अकबका कर उठ बैठा। हे भगवान कहीं सच में रेड पड़ी तो मैं तो सीधे अंदर....? आजकल 'जमीर' तो वाकई दुर्लभ वस्तु है। कहीं ऐसा न हो पुरातात्विक वस्तु की तस्करी के मामले में ही धर लिया जाऊं। बचैनी बढ़ गई। सुबह होते ही पहले तिवारी जी को फोन लगाया। पर बात हो न सकी। दिल की धड़कन दुरंतो एक्सप्रेस हो गई थी। भाग रही थी हचाक-हचाक। जो काम कई सालों से बीवी की डांट ने नहीं की थी सपने ने कर दिखाया था। अब मैं जल्द से जल्द 'जमीर' के इस ज़खीरे को ठिकाने लगाने की जुगत में था।
ऑफिस पहुंचा तो काम में मन लग नही रहा था। खौफ खाए जा रहा था कहीं रेड पड़ी, तो खुद ही खबर बन जाएंगे। ज़मीर वो भी एक टुच्चे से पत्रकार के पास। इज्ज़त तार-तार हो जाएगी। जग हंसाई होगी सो अलग। सोच ही रहा था कि अचानक सामने से आते हमारे 'अधिकारी' पत्रकार वर्मा जी दिख गए। मुझे लगा साक्षात भगवान मेरी मदद को उतरे हैं। मैं तुरंत उनके पास पहुंचा। नमस्कार किया, उन्होने उड़ता सा जवाब दिया। मैने कुर्सी खिसकाई और उनके पास बैठ गया।...न वो कुछ बोले, न मैने कुछ कहा....दो-चार मिनट यूं ही बैठे रहने के बाद हाथ मलते हुए मैने ही बात की शुरूआत की।
"सर, एक काम था आपसे"
"क्या काम" वर्मा जी ने आंखें तरेरते हुए पूछा
मैने सीधे ही बात रख दी। "सर, दरअसल मेरे पास 'जमीर' का स्टॉक ज्यादा हो गया है। अब डर ये लग रहा है कि कहीं रेड पड़ गई तो आय से अधिक संपत्ति के बारे में धर न लिया जाऊं। आप तो जानते ही हैं हमारी पोस्ट और तनख्वाह के लोगों का 'जमीर' रखना ग़ैरकानूनी है। तो सर अगर आप इसे रखे लें तो मेहरबानी होगी। आप कहें तो मैं खुद आपके पास पहुंचा देता हूं।"
अरे यार, कहां...। वर्मा जी ने सांस छोड़ते हुए कुर्सी पर पीछे टिकते कहा- यार बहुत मुश्किल से तो अपना स्टॉक खत्म कर पाया हूं मैं। गुरू तुमने एक गलती कर दी अगर समय-समय पर इसे निकालते रहते तो दस-बारह सालों में पूरा निकल जाता और ये दिक्कत भी नहीं होती। अब गलती की है तो सज़ा तो भुगतनी होगी। वैसे मुझे ताज्जुब हो रहा है कि इतने सालों बाद भी तुम्हारे पास 'जमीर' का इतना स्टॉक बचा है। कमाल है....- वर्मा जी ने व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंकी।
एक उम्मीद बंधी थी पर हल नहीं निकल सका। बहुत कोशिश की पर 'जमीर' का ज़खीरा अब भी वैसे का वैसा ही रखा है। कोई हो तो बताइएगा। मैने देखा है कुछ 'जमीर' के पैकेट्स में घुन लगने शुरू हो चुके है। इससे पहले कि वो पूरे खराब हों किसी अधिकारी, नेता, पुलिसवाले, पत्रकार (अधिकारी), वगैरह के काम आ जाएं तो अच्छा। ये ज़रूर है कि अपना सामाजिक-आर्थिक स्तर देख कर ही लीजिएगा कहीं ऐसा न हो कि आप भी मेरी तरह किसी मुसीबत में फंस जाएं।
- राकेश पाठक

Monday, December 2, 2013

(2-3 दिसंबर की वो दरमयानी रात, भोपाल गैस त्रासदी। किसी पत्थर पर खींची वो कहानी है, जो सदियों से सुनाई जा रही है, और शायद सदियों तक सुनाई जाएगी। कुछ पंक्तियां उनके लिए जो दर्द लिए जीते हैं।)
 
 
क्या लिखें त्रासदी के शहर...?
 
--------------------------------
भोपाल पर कहने के लिए
लिखने के लिए...
कुछ बचा है क्या...
आंसू तो बहुत पहले लिखे गए
मौत ग़ैरों ने लिखी...
सपने अपनों ने जला दिए...
और उम्मीदें...
चिंदी-चिंदी कर लुटा दी गईं
फिर लिखा क्या जाए...
राजनीति की गड्डमड्ड भाषा
उलझे हुए राहत के सुर...
छाले देता ढांढस...
क्या...?
कहें किससे लिखें किसके लिए...
और कौन लिखे...
वो जिनके अपने 29 साल पहले
एक रात में घुल गए...
सर्द जमी आंखों में ख्वाब लिए
या वो लिखें...
जो उस रात मरे नहीं
पर जलते रहे उसी चिता में
कतरा-कतरा
या कि दफ्न हो गए
क्या लिखें...
कि हुक्मरानों ने बड़ी चालाकी से आंसू पोंछे
ये लिखें कि आज भी...
सर्द चेहरा लिए कोई बच्चा
अपने बर्फ के हाथों से मिट्टी कुरेदता है
अपनी ठहरी सांसों को
ज़मीन की तहों में टटोलता है...
क्या लिखें....
कि आज भी पानी ज़हर है
आज भी वो तेज़ाबी दिन...
आंखों को झुलसाता है...
आज भी मौत का वो सौदागर याद आता है
बहुत लिख लिया...
हमारे हिस्से में यही दर्द है...
यही तस्वीरें हैं...
जिसमें नश्तर सी यादें है...
तेज़ाब के छीटें हैं
 
- राकेश पाठक

Monday, May 13, 2013

आज़ाद तो हो ये तोता



तमाम गवाहों और सबूतों के मद्देनज़र अदालत इस नतीजे पर पहुंची है तोते को पिंजरे से मुक्त किया जाए। इसे आज़ाद किया जाए। ताकि ये खुली हवा में सांस ले सके, सही और गलत में फर्क न करे। 
पर सरकार, हुजूर माई लॉर्ड, बराए मेहरबानी हमारा भी पक्ष सुने महाराज। तोता एक सरल पक्षी है। पहले ये जंगली था हमने बड़ी मुश्किल पचास सालों में इसे पालतू बनाया है हुजूर। 

तो इसमें अदालत क्या करे, अदालत चाहती है इसका आज़ाद होना ज़रूरी है

...पर जनाब, हजूरे आलिया, तोता पिंजरे से निकलेगा तो उड़ नहीं पाएगा...पिछले पचास सालों में इसकी कई पीढ़ियां इसी पिंजरे में आईं और मर खप गईं सरकार। इनकी पुश्तों ने आसमान नहीं देखा है हुजूर। देखेंगे तो बौरा जाएंगे।...फिर ऐसा न हो कि ये गुट बनाकर आएं और हमारी माननीय संसद पर, राष्ट्रपति भवन में, सरकारी दफ्तरों और इमारतों पर कब्ज़ा कर लें...

तो क्या हुआ ये भी देश के नागरिक हैं, जहां चाहें रहे उड़ें, आज़ाद तो रहेंगे हुक्म की तामील हो...

ज़रा रुकिए अन्नदाता, ये उड़ेंगे तो देश में लोकतंत्र हिल जाएगा सरकार। ये बोलना शुरू करेंगे तो आज की तारीख से नहीं बोलेंगे...ये तब से बोलेंगे जब से हमने इन्हे पालतू बनाने की प्रक्रिया शुरू की हुजूर...।

तो उससे क्या?

उससे बेड़ा गर्क हो जाएगा सरकार। सोचिए इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। देश के लोग उसे पचा नहीं पाएंगे। नेताओं पर रहा सहा भरोसा उठ जाएगा। बड़ी थू-थू होगी हुजूर...। विश्वास डिगेगा तो कोई वोट नहीं देगा चुनाव का बहिष्कार होगा, वो हुआ तो लोकतंत्र तो खतरे में पड़ेगा न सरकार?

हम्म्...तुम्हारे दागी मंत्रियों का क्या हुआ...?

हुजूर, होगा कुछ, बहुत जल्द होगा हम न्याय के इस मंदिर को भरोसा देते हैं सरकार। प्रक्रिया शुरू हो चुकी है...धीरे-धीरे नैतिकता को जगाने की कोशिश की जा रही है महोदय। आप तो जानते हैं किसी चीज़ का इस्तेमाल सदियों से न हुआ हो तो उसे एक्टिव होने में समय लगता है न्याय देवता।...पर हमारी कोशिश लगातार जारी है, हमें उम्मीद है आम चुनावों से पहले नैतिकता जाग जाएगी सरकार। महारानी से लेकर युवराज तक नैतिकता जगाने की इस जटिल प्रक्रिया में खुद जी जान से लगे हैं हुजूर।

...पर तुम ये दावा कैसे कर सकते हो कि चुनाव से पहले नैतिकता जाग ही जाएगी।

हुजूर, अर्ज़ करना चाहता हूं। नेता की हर हरकत में देश के लिए संदेश छुपा होता है। आजकल इन बेगैरत मीडियावालों ने नेताओं की इमेज यूंही खराब कर रखी है। देखिए सरकार मंत्रियों की नैतिकता चुनाव से पहले जागेगी उसकी वजह है। क्योंकि नैतिकता जागेगी तो, उन्हें या फिर पार्टी दोनों को फायदा होगा। चलिए उन्हे अगर न भी हुआ तो पार्टी का फायदा तो तय है। फायदा होगा तो ये संदेश जाएगा कि देखो नैतिकता को कभी मत छोड़ना, ये हमेशा तुम्हे सफल बनाएगी। बस सरकार इसी महान संदेश को ध्यान में रखते हुए हमारे महान दागी मंत्री जल्दी ही इस्तीफा दे देंगे।
और नहीं दिया तो...?

अलबत्ता तो देंगे हुजूर, नहीं दिया तो ससम्मान निकाल दिया जाएगा।

कब तक?

वो भी आम चुनाव से पहले सरकार। तब हम मान लेंगे कि उनकी नैतिकता कोमा में नहीं है मर चुकी है। फिर तो कोई गुंजाइश ही नहीं बचती न हुजूर...

तो क्या उन्हे हमेशा के लिए पार्टी से निकाल दिया जाएगा?

अरे रे रे....खुदा उनपर रहमत बख्शे हुजूर कैसी बाते कर रहे हैं...सरकार? वो तो हमारे लिए रोल मॉडल होंगे माई लॉर्ड।

रोल मॉडल? वो दागी मंत्री?

क्षमा करें न्याय के देवता, परंतु ये तो आप मानेंगे कि सबके भीतर कुछ न कुछ अवगुण और सगुण दोनों होते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था पाप से घृणा करो पापी से नहीं...और हम तो गांधी के दत्तक

पुत्र है माई लॉर्ड, या कहें बस हमीं हैं...।

हम्म, तो दागी मंत्री रोल मॉडल किस तरह के होंगे?

धैर्य और आत्मबल के होंगे सरकार। हम नए आनेवाले लीडरों को बताएंगे। देखो इनके जैसा बनो,

धैर्यवान और आत्मबलवान। जो विषम परिस्थितियों में भी डिगे नहीं। इनकी संकल्प शक्ति इतनी मजबूत थी नैतिकता जगाने के सारे प्रलोभन व्यर्थ गए। ये नहीं डिगे, तो नहीं डिगे।

आखिर तुम्हारी सरकार में ऐसे मंत्री हैं क्यों...क्या मजबूरी है?

मजबूरी है हुजूर क्या करें पार्टी में माल ही ऐसा बचा है। ईमानदार, पानीदार, रौबदार लोग तो बहुत पहले निकल लिए। जो आज हैं उनमें से बहुतेरे तो चाटुकारिता के चम्मच को थामे राजनीति में आए। और जो आज आ रहे हैं वो तो माशाअल्लाह हैं, उनके एक हाथ में वो पारंपरिक चम्मच है तो दूसरे में या हथियार है या नोट है या फिर सियासत में सफल होने के 101 धूर्त तरीके वाली किताब। अब काम तो इनसे ही चलाना पड़ेगा न हुजूर।

खैर...तो हमें ये बताओ कि क्या तोते को पिंजरे में ही कैद रखोगे?

क्या फरमाते हैं हुजूर, न्याय के मंदिर से निकली हर एक बात का अक्षरश: पालन होगा सरकार। तोता पिंजरे से आज़ाद होगा और ज़रूर होगा माई लॉर्ड। उसे तत्काल पिंजरे से निकाला जाएगा हुजूर...पर आप तो जानते हैं मेरे मालिक, इंसान का दिल मोम का होता है। पचास सालों तक पाला पोसा बड़ा किया, रटाया तोता अब एक झटके से जंगल में छोड़ने से हमारा दिल टूट जाएगा सरकार। इसलिए हम इसे पिंजरे से निकाल तो देंगे पर समय समय पर, इसके पर कतरते रहेंगे ताकि ये हमें छोड़कर उड़ न जाए हुजूर, क्योंकि इंसान का दिल मोम का होता है सरकार।...हां हम इसे अब रटना भी नहीं सिखाएंगे। अब हम इसे पढ़ना सिखाएंगे। ये चुपचाप पढ़ेगा पर बोलेगा कुछ नहीं। 

Friday, December 14, 2012

विकास बलिदान मांगता है भाई

दुनिया विकास से जलती है। नहीं। दुनिया विकास करने वाले से जर बुताती है। बताइए ऐसा घोर कलयुग है कि कहने को नहीं। बेचारा बिहार था क्या। पंद्रह साल तक जंगल राज था। तब हिंया से हुंआ बिहारी दउड़ते थे। दउड़ने में भी लोचा था। सड़क ‘खरबुदही’ (मतलब चिकनी नहीं) थी। अब देखिए एकदम लकालक। कहीं चले जाइए मुंह उठाए। मुंह नीचे करके सड़क देखने की ज़रूरत नहीं है। बस धउड़ते जाइए पड़ाक-पड़ाक। ये सब कैसे हुआ? ऐसे हुआ कि आपने यानी बिहार की जनता ने नीतीश कुमार में भरोसा जताया। कहा लो भइया करो विकास। और विकास होने लग गया भाकाभक। विकास दर , दर-दर बांट दी गई। लो रट लो। बाहर कोई बिहारी कहके लताड़े तो समझा देना। हमने समझ लिया रट लिया। बाहर कोई बकबकाया तो हमने समझाया। अब आगे सुनिए।

एक दिन बिहार के सुशासन के फाउंडर को कहते सुना। “खूब पीजिए जितना मर्जी हो पीजिए जगह-जगह इसलिए मधुशाला की व्यवस्था कर दी है, पीजिए लेकिन पैसा देकर।” सुनके पुत्तू पांणे बमक गए। इ का बात हुआ मुख्यमंत्री कह रहा है दारू पीजिए। तब पुत्तू पाणे को समझाया गया था आप विकास की बात नहीं समझेंगे। “तो क्या विकास दारू से होता है।” पुत्तू पाणे ने पूछा था। सब उनके ऊपर पिल पड़े। “अब सुशासन बाबू कह रहे हैं तो होगा ही” बात आई गई हो गई। इस बीच दनादन मधुशालाएं खोली गईं। विकास होने लगा। लठैत-बलैत ‘बियर शॉप’ खोलने लगे। समाज विकास को ‘बियर’ करने लगा। जिन लोगों ने नए दौर के विकास की खिलाफत की उनकी विकास की गंगा बहा रहे ‘बियरों’ (धनभालू) ने भरहीक खातिरदारी की। इसमें समाजवाद का खयाल रखा गया हर उम्र, हर जाति, हर मजहब, हर लिंग को एक दृष्टि से देखते हुए उनकी पुष्ट सुताई की गई। आखिर ये सरकारी काम में बाधा जैसा था।

पुत्तू पाणे अखबार हाथ में लिए दनदनाते हुए दालान में पहुंचे। “गुरू बाहर निकलो।” आवाज़ सुनके लगा कि जैसे अपने उधार की वसूली करने आए हों और नहीं दिया तो खैर नहीं। मैंने कमरे की खिड़की से झांकते हुए चुप रहने का इशारा किया और कहा बस आया पाणे जी। नीचे पहुंचा तो उन्होने तड़ से अखबार मेरे हाथ में थमाते हुए कहा- “लो देखो विकास दू दर्जन से ज्यादा लोग निपट गए दारू के चक्कर में। अब बोलो?”

दरअसल पत्तू पाणे जैसे लोगों की समस्या यही है। नज़रिए का फर्क है। विकास के एजेंडे को और उसके रास्ते को आम आदमी और पुत्तू पाणे जैसे टुच्चे मध्यमवर्गी लोग कभी नहीं समझ सकते। ये लोग ये समझते हैं कि विकास ऐसे ही हो जाता है। गंवार कहीं के। अरे विकास के लिए बलिदान देना पड़ता है। हर डिपार्टमेंट विकास की राह में बलिदान मांगता है ये एक बड़ा यज्ञ है भाई। अब देखिए किसी न किसी की बलि तो देनी पड़ेगी न। ये तो भारतीय परंपरा का हिस्सा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास हो रहा है हर साल दो सौ लोग करीब-करीब अपनी बलि देते हैं। स्वेच्छा से। कोई दबाव नहीं होता कि भईया दो ही। ये जानते हुए कि ‘इनसेफेलाइटिस’ को समझने और जानने तक में ही सरकारी डॉक्टर उनको निपटा देंगे वो पहुंचते हैं सरकारी अस्पतालों में।

अपराध को रोकने को लेकर विकास हो रहा है। लेकिन ज्ञानी व्यक्ति ही इसे समझ सकता है। रामचरित मानस की पंक्ति याद करिए ‘जस जस सुरसा बदन बढ़ावा, तास दून कपि रूप दिखावा।’ अरे मूरख अपराध बढ़ेगा तभी तो पुलिस डबल रूप दिखाएगी। ठीक वैसे ही दारू के ठेके खुलेंगे तो सरकारी खजाने में खनखन होगी। सरकारी खज़ाना भरेगा तभै तो विकास होगा। हां एक विनम्र निवेदन सुशासन बाबू से, कि उन्हे एक बयान जनहित में जारी करना चाहिए देखो भइया अगली बार से ब्रांडेड लो। नहीं तो पुत्तू पाणे ‘इमोशनल फूल’ जैसे लोग कहीं विकास की इस गंगा को नज़रिया न दें मुंए।

Thursday, November 15, 2012

हमारा फेसबुकिया समाज

पिछले लंबे समय से ये विचार मेरे दिमाग में चल रहा था कि दीपावली के शुभ अवसर पर अपने फेसबुक समाज को एक विद्वान की शैली में शुभकामना संदेश दूं। लेकिन नून-तेल-लकड़ी के जुगाड़ में वक्त मिला नहीं। मैं धन्य हो जाता हूं जब अपने इस समाज को पुष्पित और पल्लवित होते देखता हूं। दिल बगीचा होता है कि एक से बढ़कर एक लोग मुंह उठाए (गलत सेंस में न लें इसका मतलब गर्व से है) यहां टहलते पाए जाते ...
हैं। इस समाज में सब हैं साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, चित्रकार, गवइए, बजइए, अध्यापक, इंजिनयर, डॉक्टर, प्रोफेसर, नेता, अभिनेता जो फ्री ऑफ कॉस्ट ज्ञान देते हैं कोई चार्ज नहीं। ये अत्यंत हर्ष का विषय है कि दुनिया में समाजवाद हो न हो यहां समाजवाद दिखता है।

हांलाकि दिक्कत ये है कि अगर गवइए की प्रतिभा गाने की है तो वो इस समाज में प्रतिभा प्रदर्शन कैसे करे उसके लिए ये थोड़ा जटिल हो जाता है। पहले गाए, रिकॉर्ड करे फिर अपलोड करे वगैरह-वगैरह। उसके बाद काम शुरू होता है हमारा कि हम उसे सुने, पर सुने कैसे इयर फोन तो है नहीं, जिस पीसी पर काम करते हैं उसका स्पीकर तो खराब है। पिछले दिनों ऑफिस में बिंदु कुमार यही कर रहे थे। उनके किसी गवइए मित्र ने ऐसा ही कुछ गा कर अपलोड किया था। आवाज़ धीमी आ रही थी। उसको सुनने के लिए बाईं ओर झुके, कान को स्पीकर तक पहुंचाना था...मगर कमबख्त कुर्सी को ये गंवारा न हुआ बैलेंस बिगड़ा और वो तुनक के खिसक गई। इसमें हुआ ये कि जिस कान को स्पीकर तक पहुंचना था वो ज़मीन पर पड़ा था। पूरे शरीर का भार लिए। खैर...। तो ये समस्या है मुझे लगता है मार्क जूकर बंधु इधर ध्यान देंगे। मामला कुछ बन जाए तो अपने फेसबुकिया समाज में गवइए भी फले फूलें।

नेता भी फेसबुक पर बहुतायत में पाए जा रहे हैं। कोई हर हफ्ते अपनी फोटू बदलता है कोई भाषा। जो कभी सात्विक होती है कभी तामसिक। कुछ नेता तो जोक (खून चूसनेवाला नहीं) लिखते पाए गए हैं। बताइए इतने सरल टाइप नेता जिस समाज में हों तो गर्वानुभूति से भला कौन बच सकता है। महात्मा गांधी के वक्त अगर फेसबुक आ गया होता तो उनका जोकसंग्रह भी पढ़ने का मौका मिलता। क्योंकि बापू तो और भी ज्यादा हाजिर जवाब थे। आज के नेता जवाब दें न दें हाजिर हर मौके और हर समाज में रहते हैं।

अभिनेता भांति-भांति के पोज़ के साथ उतरते हैं। हम यहां एक पूरा पन्ना लिख दें। समाज, राजनीति, देश ओबामा-ओसामा सब पर लिख डालें लेकिन ‘लाइकिंग’ कंगाली स्टाइल में ही होती है। पर इनको देखिए एक लाइन लिखा नहीं कि हजारों कमेंट, अरे कमेंट लिखनेवालों ज़रा ये भी समझो अगले ने पढ़ा भी या नहीं। अपन के पोस्ट पर लिख देते तो बाकायदा नाम उच्चारित करते हुए धन्यवाद ज्ञापन होता। कोफ्त तो होती है साहब ज़मीनी समाज में जगह नहीं मिल पाई थी, तब तो आए थे फेसबुक पर, अब ये हिंया भी पहुंच गए, बताइए, हद है।

फिर पत्रकार हैं। वाह। अपने कर्म से बाज नहीं आएंगे। जहां खड़े होंगे मुंह टेढ़ा किए। इंतज़ार करते कि हमसे भी कोई कुछ कहे। नहीं तो, हम कहेंगे नहीं पेट में चिकोटी काटेंगे। पिछले दिनों मैंने फेसबुक समाज में उपस्थित बड़े, छोटे, मंझोले और कुछ हम जैसे खंघोले (वो जो छोटे से भी गए गुजरे हैं) पत्रकारों की फोटुओं का अध्ययन किया। इसमें मैंने पाया कि ये सब चाहे बड़े ब्रांड में हों या छोटे, अखबार में हों चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया में, चश्मे के या बगैर चश्मे के, दाढ़ी या निर्दाढ़ी। ये बड़े खुराफातिए होते हैं। नटखट। कुछ फोटो में पाजीपन की कुछ मात्रा भी पाई गई। आप ने ध्यान न दिया हो तो एक बार देखिएगा ज़रूर। खुराफात आपको मिलेगी।

फेसबुक समाज की एक और विधा का मै कायल हूं। कि अगर वक्त नहीं है तो लिखिए मत ‘लाइक’ कर दिजिए। माना कि भारतीय हर विषय पर टिप्पणी करने की नैसर्गिक प्रतिभा रखते हैं पर समयाभाव तो अब यहां भी है। पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने अपने टूटे टांग की तस्वीर फेसबुक पर साट दी। 175 लोगों ने उसे लाइक किया। कुल जमा तीन टिप्पणियां आईं। एक में लिखा था ’अरे’, दूसरे में लिखा था ‘कैसे’, तीसरी टिप्पणी खुद मेरे टूटे टांग वाले मित्र की थी लिखा था थैंक्स मित्रों। सच कहता हूं मुझे इस संवाद का मतलब आज तक समझ नहीं आया। वैसे टिप्पणी करने से याद आया कि टिप्पणी किसी भी विषय पर बनारसियों से करवा लिजिए। वैसा माल कहीं और नहीं मिलेगा। संकटा प्रसाद ने नक्की यादव से उनके नए लंगोट के रंग बारे में टिप्पणी मांगी। नक्की ने कहा ‘क्या टिप्पणी दें रंग चाहे जो हो, जाना तो दक्खिन ही है।‘

Tuesday, November 29, 2011

आखिर हंगामा करना क्यों ज़रूरी है ?

खुदरा सेक्टर में विदेश निवेश को लेकर हाय तौबा मची है। हल्ला हंगामा सड़क से संसद तक में है। सरकार अड़ी है और लोकल ट्रे़डरों से लेकर उपभोक्ताओं तक के पास सवालों की झड़ी है। मसला गंभीर भी है कि आखिर खुदरा बाज़ार के 51 फीसदी हिस्से को कब्ज़ाने के बाद मोहल्ले के अंकल, आंटी या फिर चचा की दुकान का क्या होगा। महंगाई से त्रस्त और पस्त जनता पूछ रही है कहीं ये एक कदम ही तो काफी नहीं बर्बादे गुलिस्तां करने को। अपने अपने तर्क हैं...सरकारी कहती है...

छोटे मंझोले उद्योगों को फायदा होगा
किसानों को उपज का अच्छा दाम मिलेगा
उपभोक्ताओं को भी होगा लाभ
रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे
कंप्टीशन के वजह से चीज़े सस्ती होंगी

ये सारे तर्क हैं जिनको रखते हुए मनमोहन सरकार ने मल्टीब्रांड के लिए 51 फीसदी और एक ब्रांड के लिए 100फीसदी तक विदेशी निवेश को मंजूरी दी है। लेकिन तजुर्बा कुछ और ही तस्वीर पेश करता है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा फरमाते हैं कि तीन साल में रिटेल सेक्टर एक करोड़ नौकरियां उगलेगा। ऐसा दावा तब भी किया गया था जब पेप्सी और कोला को भारतीय बाज़ार में घुसाने की हाड़तोड़ कोशिश की गई थी। नौ मन तेल तो हुआ लेकिन...राधा नहीं नाचीं। बातें हवाई नहीं तर्कों के साथ हैं...

रिटेल की बड़ी कंपनियों का जोर कम कीमत पर उत्पादों की सोर्सिंग करने पर होता है
ज़रूरी नहीं वो स्थानीय उत्पादकों को ही तरजीह दें
स्थानीय उत्पादकों को फायदा पहुंचाना उनकी प्राथमिकता नहीं
बाज़ार में मोनोपोली होने के बाद अगर दाम बढ़े फिर क्या

बात यहीं खत्म नहीं होती। जर्मनी और दक्षिणी कोरिया में वालमार्ट को हाल ही में खारिज किया जा चुका है। जापान में घुसने के लिए अमेरिकी कंपनियों ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया लेकिन जापान ने गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। थाइलैंड की खुदरा बाज़ार की तस्वीर और चौंकाने वाली है। यहां पिछले सालों में बड़ी रिटेल कंपनियों ने पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया और छोटे रिटेलर्ल्स को निगल गईं। ऐसे अगर खुदरा सेक्टर और उपभोक्ता दोनों के दिल बैठे जाएं तो मसला गंभीर हो जाता है और फिर ये फैसला सरकार की तरफ से थोपा हुआ सा लगता है।