Monday, December 2, 2013

(2-3 दिसंबर की वो दरमयानी रात, भोपाल गैस त्रासदी। किसी पत्थर पर खींची वो कहानी है, जो सदियों से सुनाई जा रही है, और शायद सदियों तक सुनाई जाएगी। कुछ पंक्तियां उनके लिए जो दर्द लिए जीते हैं।)
 
 
क्या लिखें त्रासदी के शहर...?
 
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भोपाल पर कहने के लिए
लिखने के लिए...
कुछ बचा है क्या...
आंसू तो बहुत पहले लिखे गए
मौत ग़ैरों ने लिखी...
सपने अपनों ने जला दिए...
और उम्मीदें...
चिंदी-चिंदी कर लुटा दी गईं
फिर लिखा क्या जाए...
राजनीति की गड्डमड्ड भाषा
उलझे हुए राहत के सुर...
छाले देता ढांढस...
क्या...?
कहें किससे लिखें किसके लिए...
और कौन लिखे...
वो जिनके अपने 29 साल पहले
एक रात में घुल गए...
सर्द जमी आंखों में ख्वाब लिए
या वो लिखें...
जो उस रात मरे नहीं
पर जलते रहे उसी चिता में
कतरा-कतरा
या कि दफ्न हो गए
क्या लिखें...
कि हुक्मरानों ने बड़ी चालाकी से आंसू पोंछे
ये लिखें कि आज भी...
सर्द चेहरा लिए कोई बच्चा
अपने बर्फ के हाथों से मिट्टी कुरेदता है
अपनी ठहरी सांसों को
ज़मीन की तहों में टटोलता है...
क्या लिखें....
कि आज भी पानी ज़हर है
आज भी वो तेज़ाबी दिन...
आंखों को झुलसाता है...
आज भी मौत का वो सौदागर याद आता है
बहुत लिख लिया...
हमारे हिस्से में यही दर्द है...
यही तस्वीरें हैं...
जिसमें नश्तर सी यादें है...
तेज़ाब के छीटें हैं
 
- राकेश पाठक

Monday, May 13, 2013

आज़ाद तो हो ये तोता



तमाम गवाहों और सबूतों के मद्देनज़र अदालत इस नतीजे पर पहुंची है तोते को पिंजरे से मुक्त किया जाए। इसे आज़ाद किया जाए। ताकि ये खुली हवा में सांस ले सके, सही और गलत में फर्क न करे। 
पर सरकार, हुजूर माई लॉर्ड, बराए मेहरबानी हमारा भी पक्ष सुने महाराज। तोता एक सरल पक्षी है। पहले ये जंगली था हमने बड़ी मुश्किल पचास सालों में इसे पालतू बनाया है हुजूर। 

तो इसमें अदालत क्या करे, अदालत चाहती है इसका आज़ाद होना ज़रूरी है

...पर जनाब, हजूरे आलिया, तोता पिंजरे से निकलेगा तो उड़ नहीं पाएगा...पिछले पचास सालों में इसकी कई पीढ़ियां इसी पिंजरे में आईं और मर खप गईं सरकार। इनकी पुश्तों ने आसमान नहीं देखा है हुजूर। देखेंगे तो बौरा जाएंगे।...फिर ऐसा न हो कि ये गुट बनाकर आएं और हमारी माननीय संसद पर, राष्ट्रपति भवन में, सरकारी दफ्तरों और इमारतों पर कब्ज़ा कर लें...

तो क्या हुआ ये भी देश के नागरिक हैं, जहां चाहें रहे उड़ें, आज़ाद तो रहेंगे हुक्म की तामील हो...

ज़रा रुकिए अन्नदाता, ये उड़ेंगे तो देश में लोकतंत्र हिल जाएगा सरकार। ये बोलना शुरू करेंगे तो आज की तारीख से नहीं बोलेंगे...ये तब से बोलेंगे जब से हमने इन्हे पालतू बनाने की प्रक्रिया शुरू की हुजूर...।

तो उससे क्या?

उससे बेड़ा गर्क हो जाएगा सरकार। सोचिए इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। देश के लोग उसे पचा नहीं पाएंगे। नेताओं पर रहा सहा भरोसा उठ जाएगा। बड़ी थू-थू होगी हुजूर...। विश्वास डिगेगा तो कोई वोट नहीं देगा चुनाव का बहिष्कार होगा, वो हुआ तो लोकतंत्र तो खतरे में पड़ेगा न सरकार?

हम्म्...तुम्हारे दागी मंत्रियों का क्या हुआ...?

हुजूर, होगा कुछ, बहुत जल्द होगा हम न्याय के इस मंदिर को भरोसा देते हैं सरकार। प्रक्रिया शुरू हो चुकी है...धीरे-धीरे नैतिकता को जगाने की कोशिश की जा रही है महोदय। आप तो जानते हैं किसी चीज़ का इस्तेमाल सदियों से न हुआ हो तो उसे एक्टिव होने में समय लगता है न्याय देवता।...पर हमारी कोशिश लगातार जारी है, हमें उम्मीद है आम चुनावों से पहले नैतिकता जाग जाएगी सरकार। महारानी से लेकर युवराज तक नैतिकता जगाने की इस जटिल प्रक्रिया में खुद जी जान से लगे हैं हुजूर।

...पर तुम ये दावा कैसे कर सकते हो कि चुनाव से पहले नैतिकता जाग ही जाएगी।

हुजूर, अर्ज़ करना चाहता हूं। नेता की हर हरकत में देश के लिए संदेश छुपा होता है। आजकल इन बेगैरत मीडियावालों ने नेताओं की इमेज यूंही खराब कर रखी है। देखिए सरकार मंत्रियों की नैतिकता चुनाव से पहले जागेगी उसकी वजह है। क्योंकि नैतिकता जागेगी तो, उन्हें या फिर पार्टी दोनों को फायदा होगा। चलिए उन्हे अगर न भी हुआ तो पार्टी का फायदा तो तय है। फायदा होगा तो ये संदेश जाएगा कि देखो नैतिकता को कभी मत छोड़ना, ये हमेशा तुम्हे सफल बनाएगी। बस सरकार इसी महान संदेश को ध्यान में रखते हुए हमारे महान दागी मंत्री जल्दी ही इस्तीफा दे देंगे।
और नहीं दिया तो...?

अलबत्ता तो देंगे हुजूर, नहीं दिया तो ससम्मान निकाल दिया जाएगा।

कब तक?

वो भी आम चुनाव से पहले सरकार। तब हम मान लेंगे कि उनकी नैतिकता कोमा में नहीं है मर चुकी है। फिर तो कोई गुंजाइश ही नहीं बचती न हुजूर...

तो क्या उन्हे हमेशा के लिए पार्टी से निकाल दिया जाएगा?

अरे रे रे....खुदा उनपर रहमत बख्शे हुजूर कैसी बाते कर रहे हैं...सरकार? वो तो हमारे लिए रोल मॉडल होंगे माई लॉर्ड।

रोल मॉडल? वो दागी मंत्री?

क्षमा करें न्याय के देवता, परंतु ये तो आप मानेंगे कि सबके भीतर कुछ न कुछ अवगुण और सगुण दोनों होते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था पाप से घृणा करो पापी से नहीं...और हम तो गांधी के दत्तक

पुत्र है माई लॉर्ड, या कहें बस हमीं हैं...।

हम्म, तो दागी मंत्री रोल मॉडल किस तरह के होंगे?

धैर्य और आत्मबल के होंगे सरकार। हम नए आनेवाले लीडरों को बताएंगे। देखो इनके जैसा बनो,

धैर्यवान और आत्मबलवान। जो विषम परिस्थितियों में भी डिगे नहीं। इनकी संकल्प शक्ति इतनी मजबूत थी नैतिकता जगाने के सारे प्रलोभन व्यर्थ गए। ये नहीं डिगे, तो नहीं डिगे।

आखिर तुम्हारी सरकार में ऐसे मंत्री हैं क्यों...क्या मजबूरी है?

मजबूरी है हुजूर क्या करें पार्टी में माल ही ऐसा बचा है। ईमानदार, पानीदार, रौबदार लोग तो बहुत पहले निकल लिए। जो आज हैं उनमें से बहुतेरे तो चाटुकारिता के चम्मच को थामे राजनीति में आए। और जो आज आ रहे हैं वो तो माशाअल्लाह हैं, उनके एक हाथ में वो पारंपरिक चम्मच है तो दूसरे में या हथियार है या नोट है या फिर सियासत में सफल होने के 101 धूर्त तरीके वाली किताब। अब काम तो इनसे ही चलाना पड़ेगा न हुजूर।

खैर...तो हमें ये बताओ कि क्या तोते को पिंजरे में ही कैद रखोगे?

क्या फरमाते हैं हुजूर, न्याय के मंदिर से निकली हर एक बात का अक्षरश: पालन होगा सरकार। तोता पिंजरे से आज़ाद होगा और ज़रूर होगा माई लॉर्ड। उसे तत्काल पिंजरे से निकाला जाएगा हुजूर...पर आप तो जानते हैं मेरे मालिक, इंसान का दिल मोम का होता है। पचास सालों तक पाला पोसा बड़ा किया, रटाया तोता अब एक झटके से जंगल में छोड़ने से हमारा दिल टूट जाएगा सरकार। इसलिए हम इसे पिंजरे से निकाल तो देंगे पर समय समय पर, इसके पर कतरते रहेंगे ताकि ये हमें छोड़कर उड़ न जाए हुजूर, क्योंकि इंसान का दिल मोम का होता है सरकार।...हां हम इसे अब रटना भी नहीं सिखाएंगे। अब हम इसे पढ़ना सिखाएंगे। ये चुपचाप पढ़ेगा पर बोलेगा कुछ नहीं। 

Friday, December 14, 2012

विकास बलिदान मांगता है भाई

दुनिया विकास से जलती है। नहीं। दुनिया विकास करने वाले से जर बुताती है। बताइए ऐसा घोर कलयुग है कि कहने को नहीं। बेचारा बिहार था क्या। पंद्रह साल तक जंगल राज था। तब हिंया से हुंआ बिहारी दउड़ते थे। दउड़ने में भी लोचा था। सड़क ‘खरबुदही’ (मतलब चिकनी नहीं) थी। अब देखिए एकदम लकालक। कहीं चले जाइए मुंह उठाए। मुंह नीचे करके सड़क देखने की ज़रूरत नहीं है। बस धउड़ते जाइए पड़ाक-पड़ाक। ये सब कैसे हुआ? ऐसे हुआ कि आपने यानी बिहार की जनता ने नीतीश कुमार में भरोसा जताया। कहा लो भइया करो विकास। और विकास होने लग गया भाकाभक। विकास दर , दर-दर बांट दी गई। लो रट लो। बाहर कोई बिहारी कहके लताड़े तो समझा देना। हमने समझ लिया रट लिया। बाहर कोई बकबकाया तो हमने समझाया। अब आगे सुनिए।

एक दिन बिहार के सुशासन के फाउंडर को कहते सुना। “खूब पीजिए जितना मर्जी हो पीजिए जगह-जगह इसलिए मधुशाला की व्यवस्था कर दी है, पीजिए लेकिन पैसा देकर।” सुनके पुत्तू पांणे बमक गए। इ का बात हुआ मुख्यमंत्री कह रहा है दारू पीजिए। तब पुत्तू पाणे को समझाया गया था आप विकास की बात नहीं समझेंगे। “तो क्या विकास दारू से होता है।” पुत्तू पाणे ने पूछा था। सब उनके ऊपर पिल पड़े। “अब सुशासन बाबू कह रहे हैं तो होगा ही” बात आई गई हो गई। इस बीच दनादन मधुशालाएं खोली गईं। विकास होने लगा। लठैत-बलैत ‘बियर शॉप’ खोलने लगे। समाज विकास को ‘बियर’ करने लगा। जिन लोगों ने नए दौर के विकास की खिलाफत की उनकी विकास की गंगा बहा रहे ‘बियरों’ (धनभालू) ने भरहीक खातिरदारी की। इसमें समाजवाद का खयाल रखा गया हर उम्र, हर जाति, हर मजहब, हर लिंग को एक दृष्टि से देखते हुए उनकी पुष्ट सुताई की गई। आखिर ये सरकारी काम में बाधा जैसा था।

पुत्तू पाणे अखबार हाथ में लिए दनदनाते हुए दालान में पहुंचे। “गुरू बाहर निकलो।” आवाज़ सुनके लगा कि जैसे अपने उधार की वसूली करने आए हों और नहीं दिया तो खैर नहीं। मैंने कमरे की खिड़की से झांकते हुए चुप रहने का इशारा किया और कहा बस आया पाणे जी। नीचे पहुंचा तो उन्होने तड़ से अखबार मेरे हाथ में थमाते हुए कहा- “लो देखो विकास दू दर्जन से ज्यादा लोग निपट गए दारू के चक्कर में। अब बोलो?”

दरअसल पत्तू पाणे जैसे लोगों की समस्या यही है। नज़रिए का फर्क है। विकास के एजेंडे को और उसके रास्ते को आम आदमी और पुत्तू पाणे जैसे टुच्चे मध्यमवर्गी लोग कभी नहीं समझ सकते। ये लोग ये समझते हैं कि विकास ऐसे ही हो जाता है। गंवार कहीं के। अरे विकास के लिए बलिदान देना पड़ता है। हर डिपार्टमेंट विकास की राह में बलिदान मांगता है ये एक बड़ा यज्ञ है भाई। अब देखिए किसी न किसी की बलि तो देनी पड़ेगी न। ये तो भारतीय परंपरा का हिस्सा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास हो रहा है हर साल दो सौ लोग करीब-करीब अपनी बलि देते हैं। स्वेच्छा से। कोई दबाव नहीं होता कि भईया दो ही। ये जानते हुए कि ‘इनसेफेलाइटिस’ को समझने और जानने तक में ही सरकारी डॉक्टर उनको निपटा देंगे वो पहुंचते हैं सरकारी अस्पतालों में।

अपराध को रोकने को लेकर विकास हो रहा है। लेकिन ज्ञानी व्यक्ति ही इसे समझ सकता है। रामचरित मानस की पंक्ति याद करिए ‘जस जस सुरसा बदन बढ़ावा, तास दून कपि रूप दिखावा।’ अरे मूरख अपराध बढ़ेगा तभी तो पुलिस डबल रूप दिखाएगी। ठीक वैसे ही दारू के ठेके खुलेंगे तो सरकारी खजाने में खनखन होगी। सरकारी खज़ाना भरेगा तभै तो विकास होगा। हां एक विनम्र निवेदन सुशासन बाबू से, कि उन्हे एक बयान जनहित में जारी करना चाहिए देखो भइया अगली बार से ब्रांडेड लो। नहीं तो पुत्तू पाणे ‘इमोशनल फूल’ जैसे लोग कहीं विकास की इस गंगा को नज़रिया न दें मुंए।

Thursday, November 15, 2012

हमारा फेसबुकिया समाज

पिछले लंबे समय से ये विचार मेरे दिमाग में चल रहा था कि दीपावली के शुभ अवसर पर अपने फेसबुक समाज को एक विद्वान की शैली में शुभकामना संदेश दूं। लेकिन नून-तेल-लकड़ी के जुगाड़ में वक्त मिला नहीं। मैं धन्य हो जाता हूं जब अपने इस समाज को पुष्पित और पल्लवित होते देखता हूं। दिल बगीचा होता है कि एक से बढ़कर एक लोग मुंह उठाए (गलत सेंस में न लें इसका मतलब गर्व से है) यहां टहलते पाए जाते ...
हैं। इस समाज में सब हैं साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, चित्रकार, गवइए, बजइए, अध्यापक, इंजिनयर, डॉक्टर, प्रोफेसर, नेता, अभिनेता जो फ्री ऑफ कॉस्ट ज्ञान देते हैं कोई चार्ज नहीं। ये अत्यंत हर्ष का विषय है कि दुनिया में समाजवाद हो न हो यहां समाजवाद दिखता है।

हांलाकि दिक्कत ये है कि अगर गवइए की प्रतिभा गाने की है तो वो इस समाज में प्रतिभा प्रदर्शन कैसे करे उसके लिए ये थोड़ा जटिल हो जाता है। पहले गाए, रिकॉर्ड करे फिर अपलोड करे वगैरह-वगैरह। उसके बाद काम शुरू होता है हमारा कि हम उसे सुने, पर सुने कैसे इयर फोन तो है नहीं, जिस पीसी पर काम करते हैं उसका स्पीकर तो खराब है। पिछले दिनों ऑफिस में बिंदु कुमार यही कर रहे थे। उनके किसी गवइए मित्र ने ऐसा ही कुछ गा कर अपलोड किया था। आवाज़ धीमी आ रही थी। उसको सुनने के लिए बाईं ओर झुके, कान को स्पीकर तक पहुंचाना था...मगर कमबख्त कुर्सी को ये गंवारा न हुआ बैलेंस बिगड़ा और वो तुनक के खिसक गई। इसमें हुआ ये कि जिस कान को स्पीकर तक पहुंचना था वो ज़मीन पर पड़ा था। पूरे शरीर का भार लिए। खैर...। तो ये समस्या है मुझे लगता है मार्क जूकर बंधु इधर ध्यान देंगे। मामला कुछ बन जाए तो अपने फेसबुकिया समाज में गवइए भी फले फूलें।

नेता भी फेसबुक पर बहुतायत में पाए जा रहे हैं। कोई हर हफ्ते अपनी फोटू बदलता है कोई भाषा। जो कभी सात्विक होती है कभी तामसिक। कुछ नेता तो जोक (खून चूसनेवाला नहीं) लिखते पाए गए हैं। बताइए इतने सरल टाइप नेता जिस समाज में हों तो गर्वानुभूति से भला कौन बच सकता है। महात्मा गांधी के वक्त अगर फेसबुक आ गया होता तो उनका जोकसंग्रह भी पढ़ने का मौका मिलता। क्योंकि बापू तो और भी ज्यादा हाजिर जवाब थे। आज के नेता जवाब दें न दें हाजिर हर मौके और हर समाज में रहते हैं।

अभिनेता भांति-भांति के पोज़ के साथ उतरते हैं। हम यहां एक पूरा पन्ना लिख दें। समाज, राजनीति, देश ओबामा-ओसामा सब पर लिख डालें लेकिन ‘लाइकिंग’ कंगाली स्टाइल में ही होती है। पर इनको देखिए एक लाइन लिखा नहीं कि हजारों कमेंट, अरे कमेंट लिखनेवालों ज़रा ये भी समझो अगले ने पढ़ा भी या नहीं। अपन के पोस्ट पर लिख देते तो बाकायदा नाम उच्चारित करते हुए धन्यवाद ज्ञापन होता। कोफ्त तो होती है साहब ज़मीनी समाज में जगह नहीं मिल पाई थी, तब तो आए थे फेसबुक पर, अब ये हिंया भी पहुंच गए, बताइए, हद है।

फिर पत्रकार हैं। वाह। अपने कर्म से बाज नहीं आएंगे। जहां खड़े होंगे मुंह टेढ़ा किए। इंतज़ार करते कि हमसे भी कोई कुछ कहे। नहीं तो, हम कहेंगे नहीं पेट में चिकोटी काटेंगे। पिछले दिनों मैंने फेसबुक समाज में उपस्थित बड़े, छोटे, मंझोले और कुछ हम जैसे खंघोले (वो जो छोटे से भी गए गुजरे हैं) पत्रकारों की फोटुओं का अध्ययन किया। इसमें मैंने पाया कि ये सब चाहे बड़े ब्रांड में हों या छोटे, अखबार में हों चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया में, चश्मे के या बगैर चश्मे के, दाढ़ी या निर्दाढ़ी। ये बड़े खुराफातिए होते हैं। नटखट। कुछ फोटो में पाजीपन की कुछ मात्रा भी पाई गई। आप ने ध्यान न दिया हो तो एक बार देखिएगा ज़रूर। खुराफात आपको मिलेगी।

फेसबुक समाज की एक और विधा का मै कायल हूं। कि अगर वक्त नहीं है तो लिखिए मत ‘लाइक’ कर दिजिए। माना कि भारतीय हर विषय पर टिप्पणी करने की नैसर्गिक प्रतिभा रखते हैं पर समयाभाव तो अब यहां भी है। पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने अपने टूटे टांग की तस्वीर फेसबुक पर साट दी। 175 लोगों ने उसे लाइक किया। कुल जमा तीन टिप्पणियां आईं। एक में लिखा था ’अरे’, दूसरे में लिखा था ‘कैसे’, तीसरी टिप्पणी खुद मेरे टूटे टांग वाले मित्र की थी लिखा था थैंक्स मित्रों। सच कहता हूं मुझे इस संवाद का मतलब आज तक समझ नहीं आया। वैसे टिप्पणी करने से याद आया कि टिप्पणी किसी भी विषय पर बनारसियों से करवा लिजिए। वैसा माल कहीं और नहीं मिलेगा। संकटा प्रसाद ने नक्की यादव से उनके नए लंगोट के रंग बारे में टिप्पणी मांगी। नक्की ने कहा ‘क्या टिप्पणी दें रंग चाहे जो हो, जाना तो दक्खिन ही है।‘

Tuesday, November 29, 2011

आखिर हंगामा करना क्यों ज़रूरी है ?

खुदरा सेक्टर में विदेश निवेश को लेकर हाय तौबा मची है। हल्ला हंगामा सड़क से संसद तक में है। सरकार अड़ी है और लोकल ट्रे़डरों से लेकर उपभोक्ताओं तक के पास सवालों की झड़ी है। मसला गंभीर भी है कि आखिर खुदरा बाज़ार के 51 फीसदी हिस्से को कब्ज़ाने के बाद मोहल्ले के अंकल, आंटी या फिर चचा की दुकान का क्या होगा। महंगाई से त्रस्त और पस्त जनता पूछ रही है कहीं ये एक कदम ही तो काफी नहीं बर्बादे गुलिस्तां करने को। अपने अपने तर्क हैं...सरकारी कहती है...

छोटे मंझोले उद्योगों को फायदा होगा
किसानों को उपज का अच्छा दाम मिलेगा
उपभोक्ताओं को भी होगा लाभ
रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे
कंप्टीशन के वजह से चीज़े सस्ती होंगी

ये सारे तर्क हैं जिनको रखते हुए मनमोहन सरकार ने मल्टीब्रांड के लिए 51 फीसदी और एक ब्रांड के लिए 100फीसदी तक विदेशी निवेश को मंजूरी दी है। लेकिन तजुर्बा कुछ और ही तस्वीर पेश करता है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा फरमाते हैं कि तीन साल में रिटेल सेक्टर एक करोड़ नौकरियां उगलेगा। ऐसा दावा तब भी किया गया था जब पेप्सी और कोला को भारतीय बाज़ार में घुसाने की हाड़तोड़ कोशिश की गई थी। नौ मन तेल तो हुआ लेकिन...राधा नहीं नाचीं। बातें हवाई नहीं तर्कों के साथ हैं...

रिटेल की बड़ी कंपनियों का जोर कम कीमत पर उत्पादों की सोर्सिंग करने पर होता है
ज़रूरी नहीं वो स्थानीय उत्पादकों को ही तरजीह दें
स्थानीय उत्पादकों को फायदा पहुंचाना उनकी प्राथमिकता नहीं
बाज़ार में मोनोपोली होने के बाद अगर दाम बढ़े फिर क्या

बात यहीं खत्म नहीं होती। जर्मनी और दक्षिणी कोरिया में वालमार्ट को हाल ही में खारिज किया जा चुका है। जापान में घुसने के लिए अमेरिकी कंपनियों ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया लेकिन जापान ने गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। थाइलैंड की खुदरा बाज़ार की तस्वीर और चौंकाने वाली है। यहां पिछले सालों में बड़ी रिटेल कंपनियों ने पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया और छोटे रिटेलर्ल्स को निगल गईं। ऐसे अगर खुदरा सेक्टर और उपभोक्ता दोनों के दिल बैठे जाएं तो मसला गंभीर हो जाता है और फिर ये फैसला सरकार की तरफ से थोपा हुआ सा लगता है।

Saturday, January 8, 2011

(टूटे विचार कुछ...जो पता नहीं कहां से, किस तरह ज़ेहन में टूट कर गिरे...इनका कोई सिरा मिले तो बताइएगा...पिछले कुछ दिनों से मन में ऐसी ही टूटी तस्वीरें बनती रहीं...न मुकम्मिल लफ्ज़ मिला कोई...न ही स्पष्ट आवाज़ सुनाई दी भीतर से...फिर भी...)
1.
बेतरतीब नफ़रत...
करीने से सजी मोहब्बत...  
अच्छी होती है
उसने कहा...
दोनों अंजाम तक पहुंचते हैं...
चुनना क्या है...
ये फैसला आप पर...

2.
उलझनें इतनी न हों ज़िंदगी में
सही और ग़लत पास-पास दिखे
इतना तो रहे कि...
कह सकें...
ये सही है और ये ग़लत

3.
दर्ज हो रहा है सब
ये सोचकर क्या लिखोगे नहीं...
कहोगे नहीं...
चलो...ठीक है
सुनो तो सही...
तुम्हारे उजाले में
हर रोज़ कोई सेंधमारी कर रहा है
आग चूल्हों से नहीं उठ रही...
कोई घर जल रहा है...

Wednesday, December 15, 2010

आईने...

1.
तुम आइने से साफ दिखते हो                  
सच कहो कितना हिसाब रखते हो
यहां हर मोड़ पर उलझते हैं रिश्ते
तुम कैसे सब साफ पाक रखते हो

2.
हर तरफ आइने रहने दो
हर तरफ इक सी शक्ल उतेरगी
न तोड़ पाएगा एक भी संग इसे
हर कहानी अपनी ही नज़र आएगी

3.
आइने से तस्वीरें ले लेकर
चस्पा हर गली मुहल्ले में हुई
ये आदमी गुम गया है कहीं
मिले तो मेरे घर का पता देना

4.
लम्स तुम्हारा मिला मुझे
अपनी तस्वीर को छूकर
चेहरे की लकीर ने मुस्काराकर
गुज़रे लम्हों की हरारत दे दी

5.
चौंक गया वो आइने में तस्वीर देखकर
घर से निकला था तब, चेहरा ऐसा तो नहीं था
या कि वो घर पर ही छूट गया
घर में लगे आइने को पता होगा