Wednesday, December 24, 2014

एक भैंसपति का दर्द

परेशां रात सारी सितारों तुम सो जाओ....आजकल यही गज़ल सुनते सुनते वो सो जाते हैं। मन बहुत उदास है। इतना उदास कि खाना-पीना, दिसा-मैदान सब भरसक टल जाने की स्थिति तक टालते हैं। करें क्या? उनकी भैंस सिक्कड़ के साथ उड़ा दी गई। मुरैना में आजकल भैंस उड़ाउ गैंग सक्रीय है। तीन भैंसें मरदूद कट्टे दिखाते ले उड़े। वैसा ही वाकया उनके साथ भी हुआ है। वो अक्सरहां सोचते हैं कि काश कि हम आज़म खां रहे होते। काश कि मुरैना में समाजवाद रहा होता। पर हाय रे किस्मत।
इससे याद आया कि वाकई यूपी की जनता ने एक बेहद संवेदनशील सरकार तो चुनी है। मुझे तो शक ये भी होता है कि चोरों ने आज़म की भैंस यूपी की कानून व्यवस्था का औचक टेस्ट करने की नीयत से उड़ाई होगी। और बहादुर दिलेर यूपी पुलिस ने साबित किया कि वो अक्ल और भैंस दोनों को ही उचित सम्मान देते अपने काम में दक्ष है। पर मध्यप्रदेश के मुरैना में हाल बेहाल हैं। वो कोस रहे हैं कानून-व्यवस्था बताइए। "बीतै ठाड़ी रही थी भैंस...बा ने मूड़ में लट्ठ मारौ..." और वो फूटकर रोने लगते हैं।
एसपी भरोसा देते हैं। चिंता मत करिए मिल जाएगी। इस बीच एसपी गौर से उनके चेहरे को कई एंगिल से देखते हैं। मैने पूछा इतनी गंभीरता आप इन्हे क्यों देख रहे हैं? क्या आपको इनपर ही अपनी भैंस चुराने का शक है? वो बोले - "नहीं जी....मैं तो अपने लिए प्रेरणा खोज रहा हूं....।" मैं चौंका - "प्रेरणा और पीड़ित के चेहरे पर???"
"जी! दरअसल मैं देख रहा हूं कि इनका चेहरा बस किसी एंगिल से सूबे के किसी मंत्री से मिल जाए फिर देखिए रातों रात भैंस हाजिर कर दूंगा।"- एसपी साहब ने जवाब दिया
ईश्वर किसी को कुछ दे या न दे। लेकिन किसी भैंसपति को आज़म खां या फिर सूबे के किसी दूसरे मंत्री सा चेहरा ज़रूर दे। कम से कम एक एंगिल से ही सही।

Tuesday, December 23, 2014

जनता परिवार का काक स्नान

बिछिला के गिरना एक कला है। मुझे याद आता है गंगा जी के दशाश्मेध घाट पर जो लोग मां गंगा का जल अपने सिर पर फेंकने आते थे उन्हे मां गंगे हर-हर कराने में देर नहीं करती थीं। लपक के तमाम ऐसे लोग सट्ट से पानी में गोत जाते थे ऑटोमैटिक व्यवस्था थी। घाट के किनारे की सीढ़ियों पर लगी काई इसमें विलक्षण भूमिका निभाती थी। और शायद तमाम नहान शहीदों पर बाद में खिखियाती भी होगी। ठेठ भाषा में इसे बिछलाना कहते हैं।
आज बिछलाना याद आया न जाने कहां से, जब दिल्ली में जनता परिवार का दमघोंटू जमावड़ा देख रहा था टीवी पर। कौन समाजवादी ये वाहियात जमात? कौन नेता लालू, मुलायम और नीतीश-शरद??? कौन सा समाजवाद बिहार वाला या मौजूदा यूपी वाला? लोहिया को ज़मीन में गाड़ कर पाट देनेवाले ये समाजवादी कौन सी जनता की बात कर रहे हैं? गुंडई के दौर की...जहालत के दौर की जिसने बिहार-यूपी की कई पीढ़ियों को बर्बाद करके रख दिया। या फिर उन हफ्ताखोरों की जो देश की राजनीति में छा जाने को बेताब हैं?
वामपंथ से लेकर मौजूदा समाजवाद सिर्फ और सिर्फ गंगा (जनता के मुद्दों को) को सिर पर छिड़ककर पवित्र होने पर आमादा है। इन गुंडों की फौज की न तो कोई हैसियत है न बिसात। मैने देखा है कैसे यूपी समाजवादियों के आने पर बदलती है। कैसे गिरहकटों की जमात अचानक कार्यकर्ताओं में तब्दील हो जाती है। उजड्ड, फूहड़ और बेअक्ल लोगों की जमात। इन्हे बिछला के गिरना होगा...नहीं गिरे तो अड़ंगी लगा के गिराया जाए...पर गिरना ज़रूरी है। कोई सत्ता में आए या जाए...बिहार और यूपी को बर्बाद करने वाले इन लुहेड़ों और लंपटों से तो देश बचना ही चाहिए। और नीतीश को क्या कहें...बेग़ैरत इंसान की महत्वाकांक्षा जब आसमान पर चढ़कर नीचे गिरती है तो किरच-किरच कर टूटती है, तब इंसान, इंसान नहीं रह जाता रेप्टाइल हो जाता है। बिना रीढ़ वाला। घिसट कर चलनेवाला और जीभ लपलपाने वाला। जिसकी आंखों में लाल रेशे हैं और वो एक जमात में शामिल होकर भी चोर नज़र के साथ बैठा है।

Tuesday, December 16, 2014

पत्रकारिता द्वितीयोध्याय:

तो वटवृक्ष के नीचे मुनि नारद और शुकदेव जी महाराज आसनारूढ़ हुए। नारद जी ने कहा- "हे मुनिवर ध्यान से बैठिएगा जिसप्रकार मिष्ठान के सुगंध से चीटिंयां खींची चली आती हैं उसी प्रकार ज्ञान की सुगंध से आलोचक रूपी चींटे पहले ही जगह खोज के बैठ जाते हैं। कहीं ऐसा न हों आप उनपर बैठ जाएं और वो...नारायण, नारायण।"

शुकदेव जी ने मुनिवर को प्रणाम करते अपनी कुशल क्षेम को लेकर उनकी चिंता की सराहाना की उनको बारंबार प्रणाम किया। दोनों की विद्वत् ऋषि वट वृक्ष की छाया में बैठे। आसमान में खलीहर खड़े देवताओं ने दोनों ऋषियों का जयघोष करते पुष्प वर्षा की। लेकिन जैसे ही पता चला कि इस मौके का कोई लाइव कवरेज नहीं है वो मुंह बनाए वहां से खिसक लिए।

शुकदेव जी ने एकबार फिर नारद के प्रणाम करते उनसे निवेदन किया कि - "हे मुनिश्रेष्ठ कृपा कर इस जिज्ञासु को पत्रकारिता के समूल दर्शन का लाभ दें।" "हे ऋषिवर आपको तो राजकीय पत्रकारिता कर इतना मिल जाता है कि कुछ करने-वरने की आवश्यकता नहीं किंतु मुझे तो यूं ही रगड़-घिस करनी पड़ती है। सो हे भगवन् ज्ञान दें ताकि कुछ लिख कर उसको छपवा कर मैं भी कॉपी राइट का सुख प्राप्त कर जगत को तारूं।"

इतना सुनते ही मुनिवर नारद अत्यधिक प्रसन्न भए। उन्होने कहा - हे ऋषिवर आपके ऐसा कथन से मैं अत्यधिक प्रसन्न हुआ हूं। आपकी पत्रकारिता के ज्ञान के प्रति उत्कट इच्छा और आसक्ति को देख मैं आनंदित हुआ। अब मैं जान गया हूं कि मैं किसी गलत व्यक्ति के साथ समय खोटा नहीं कर रहा हूं। बस आपसे मेरे लिए पहले ज्ञान की गुरू दक्षिणा यही है कि अपनी पुस्तक की शुरुआत में मेरी दृष्टि और मेरे ज्ञान के आलोक से चुंधियाती एक सुंदर प्रशस्ति लिखिएगा। और मजबूत तरीके से मुझे भारत रत्न या नोबल जैसा कोई सम्मान दिए जाने की वकालत कर दीजिएगा।

ऐसा कहते नारद मुनि के आंखों में पल भर को अजब सी चमक उठी फिर उन्होने आसपास देखा कि किसी ने सुना तो नहीं। शुकदेव जी महाराज ने नारद जी के इस निवेदन पर उनकी स्तुति गाई। वही पास में गिरे कुछ वन फूलों से उनका सम्मान और अभिषेक किया और इस प्रकार से पत्रकारिता द्वितियोध्याय: का प्रारंभ हुआ। ऋषि नारद ने एकतारे को टनटनाते कहा- हे "ऋषिवर जो अबतक जो अबतक गूढ़ से गूढ़ है। जहां सभी कलाएं स्वयं सिद्ध हैं। जो कथ होकर भी अकथ् है। जो संवाद होते हुए भी नि:संवाद है। जो गंभीर होते हुए भी नर्तकी के समान वाचाल है। जो साम है, दाम है दंड है भेद है, जो अविवेकशील विवेक है, जो ज्ञान से ऊपर का ज्ञान है, जो मर्दन है, जो गर्जन है, जो कृपण है, जो क्रांति से लाल है, उस महान पत्रकारिता के विलक्षण ज्ञान का विस्तारपूर्वक वर्णन करता हू ध्यान पूर्वक सुनें।"

नारद मुनि के ऐसा कहते ही आकाश से फिर देवताओं ने जय घोष करते फूल बरसाए। इन देवताओं का नेतृत्व देवराज इंद्र कर रहे थे। और बाकि सभी देवता उन्ही की चापलूसी के तहत वहां उपस्थित भए थे।

Friday, December 12, 2014

कैलाश ज्ञान

मैं अभिभूत हूं। चाल चरित्र चिंतन और प्रखर राष्ट्रवाद की एक ब्रैंड पार्टी मुझे अभिभूत करती है। मैं उनके ऱाष्ट्रवादी चिंतन का हमेशा से कायल रहा हूं। मैं गंभीर तौर पर मानता हूं कि राष्ट्र की गरिमा, सभ्यता और संस्कृति कब की खत्म हो गई होती अगर ये भगवा महापुरुष हमारे इर्द-गिर्द न होते। मैं इनकी वीरता का कायल हूं। और यकीनन उसके सामने नतमस्तक होता हूं जब दुर्गापूजा के नाम पर दर्जनों लठैत, ललाट से लेकर लार तक को लाल रंग में रंगे भभकाते मुंह के साथ चंदा मांगते हैं।

कल एक वाकया सामने आया। कैलाश सत्यार्थी को नोबेल का शांति पुरस्कार मिला (वाकया ये नहीं है...भाई)। मध्यप्रदेश की विधानसभा में पत्रकारों ने कई विधायकों से इसपर प्रतिक्रिया ली। जो मिला वो आपसे बांट रहा हूं। पूछा गया- "क्या कहेंगे कैलाश सत्यार्थी को नोबेल का शांति पुरस्कार मिलने पर?" राष्ट्रवादी पार्टी के तमाम विधायकों ने सरकार के एक मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को नोबेल का शांति पुरस्कार मिलने पर बधाई दे दी।

"वो तो हैं ही ऐसे....उनका काम कमाल है।"
"उनको तो मिलना ही था केलाश भइया शांति के मसीहा हैं"
"हां तो भइया ने काम ही ऐसा किया है, विकास ही विकास कर दिया चारों तरफ...."
कानून मंत्री बहुत गंभीर हुईं। उन्होने लंबी बात कही। "कैलाश आज से नहीं बहुत पहिले से शांति के लिए काम करते रहे हैं। कई बार उन्होने अशांति फैलाने वाले को लट्ठा मारकर भगाया है।" 

राष्ट्र अपने गौरव के क्षणों में विधायकों की इस तस्वीर पर माथा पीट ले। राष्ट्रवादी होने पर शर्म आ जाए। अब ज़रा विपक्ष यानि कांग्रेसियों को सुनिए-
एक ने कहा- अरे भइया जब राज्य में इनकी सरकार केंद्र में इनकी सरकार तो नोबल सेट कर लिया होगा....
एक ने बमकते हुए- विधानसभा में सवाल उठाते गड़बड़झाले का आरोप लगा दिया।
एक कांग्रेसी विधायक तो कपड़ा फाड़ लोट गए बोले- व्यापम क्या कम था, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा घोटाला कर दिया। इस्तीफा दो, इस्तीफा दो।

इस सबके बीच मैने राष्ट्रवाद और संवेदहीनता की दुहाई देते पार्टी के मीडिया प्रभारी से पूछा- कुछ तो करिए, आपके विधायक सब लीपपोत चौका कर रहे हैं। उनका जवाब था- होश में रहिए, वो जो कर रहे हैं करने दीजिए, राष्ट्रवादी जो कहता है वही ध्रुव है। हमने सरकारी विभागों का ठेका लेने से मना किया है कुछ ठेके अभी भी हमारे पास हैं औऱ वो रहेंगे, खबरदार।

Wednesday, December 10, 2014

पुरातन पद्धति पर चर्चा


कल एक खबर आई। एक साहब को किसी ने धमकी भरा खत लिखा। ये खत उनकी कार में छोड़ा गया था। पत्र के साथ एक खाली कारतूस भी रखी गई थी। पत्र में लिखा था "कायदे से रहो वर्ना तुम्हारे होश को ठिकाने लगा देंगे।" लंबे समय बाद इमेल-व्हाट्स एप के दौर में खालिस पत्र परंपरा को ज़िंदा रखने की कवायद करनेवाले इस धमकीबाज़ के प्रति दिल श्रद्धा से भर गया। और दूसरी वो व्यक्तिसेवा भी दीगर थी जिसमें धमकीबाज़ ने साहब के होश ठिकाने लगा देने की बात कही थी।
होश बहुत लंबे समय से ठिकाने लगाने की परंपरा भी अब करीब-करीब विलुप्तप्राय है। अब तो बहुधा व्यक्ति को ठिकाने लगा देने का प्रयोग सीधे कर लिया जाता है। मैं तो इस बात का पक्का हिमायती हूं कि बहुत सारे लोगों के होश अगर ठिकाने लगा दिए जाएं तो समाज को भला हो जाए। पर यहां एक सवाल पैदा होता है कि ये होश ठिकाने लगता कैसे है। धमकीबाज़ जब अपने होश ठिकाने लगाने की विशेषज्ञता का चि्टठी में ज़िक्र कर हो तो उसके पहले उसे इस बात का खुलासा भी करना चाहिए कि अमुक-अमुक सूत्रों या लक्षणों के ज़रिए इस बात की पुष्ट होती है कि आपका होश अपने ठिकाने से निकलकर इधर-उधर चला गया है।
....और फिर एक और खबर इसी दिन सामने आई कि कुछ हिंदुवादियों ने आगरा में धर्म परिवर्तन (भ्रम में रखकर) कराने का एक अद्भुत विराट और विलक्षण कार्य किया। ये अचानक इन वीरों को हुआ क्या? मैं ये समझ न सका। कल तक तो माथा भर तिलक पोत कर बड़ी-बड़ी लाल आंखे लिए चंदा वसूली करते थे। इनका होश ठिकाने पर है या कि अब मूल ठिकाने से कहीं और निकल गया है। मानक विचलन निकालना ज़रूरी है। क्योंकि इसके बाद ही ये तय हो पाता है कि वापस होश को मूल स्थान पर लाने के लिए किस पद्दति की आवश्यकता पड़ेगी। इसमें पत्र व्यवहार से लेकर कानून व्यवहार और ठोंक बजावन व्यवहार तक की अचूक पद्धतियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। होश ठिकाने पर लाने की पद्धति पुरानी है पर है कारगर...।

Friday, December 5, 2014

बनारस में एक प्रदर्शन


लोहिया जिंदाबाद!!!
जिंदाबाद-जिंदाबाद!!!
राजनरायन जिंदबादा!!!
जिंदाबाद-जिंदाबाद!!!
बोल मोलायम हल्ला बोल
तोड़ जेल, अपराधी खोल
"भाइयों अउर बहनों। ई सांप्रदायिक ताकत सब शांति देश का माहौल बिगाड़ रहा है। हमना कहना चाहते हैं, सुन लो कान खोल के। हम लोहिया, राजनरायन, मिश्र जी संताने हैं। हम हिलेंगे नहीं। डटेंगे यहीं। उखाड़ लो जो उखाड़ना है।"
(तालियां-तालियां-तालियां.....खी...खी...खी...खी....)
लोहिया जिंदाबाद!!!
जिंदाबाद-जिंदाबाद!!!
राजनरायन जिंदबादा!!!
जिंदाबाद-जिंदाबाद!!!
"हमारे खून में समाजवाद है। हमारे कपारे पर समाजवाद है। औ हम समाजबादी लोहिया जी, राजनरायन जी अउऱ पंडित के बलिदान को खाली नहीं जाने देंगे।"
(तालियां-तालियां-तालियां.....खी...खी...खी...खी....)
अचानक माइक से घूम कर धीमे आती आवाज़। - "अरे हरे उधरिया ख़डा हो सारे.....मार देब सरउ बिछला जइबा....."
आवाज़ फिर तेज़ हुई- "हम समाजवाद के लिए जान देने को तैयार हैं"---- "इ पुलिस हमारा कुछौ नहीं बिगड़ा सकती है। हम कुर्बानी देंगे। समाजवादी पाल्टी बांटनेवाली ताकतों को सत्ता में नहीं आने देगी।"
(तालियां-तालियां-तालियां.....खी...खी...खी...खी....)
लोहिया जिंदाबाद!!!
जिंदाबाद-जिंदाबाद!!!
राजनरायन जिंदबादा!!!
जिंदाबाद-जिंदाबाद!!!
बोल मोलायम हल्ला बोल
तोड़ जेल, अपराधी खोल
"हां तो हम कह रहे थे। समाजवादी समाजवाद के नाम पर जान दे देगा। देगा कि नहीं देगा???"
"देगा...देगा...देगा.....बोल मोलायम हल्ला बोल..."
(तालियां-तालियां-तालियां.....खी...खी...खी...खी....)
"समाजवादी समाजवाद के नाम पर जान दे देगा।"
धड़ाम-धड़ाम!!!
भाग रे रजुआ भयल धमाका....!!! पुलिस चलउले गोली हौ....
(पता चला किसी बच्चे ने सुतली बम फोड़ा था....नेता जी मय कार्यकर्ता भाग खड़े हुए थे....)

Monday, November 24, 2014

पत्रकारिता


“कुतुबुद्दीन ऐबक को जानते हौ ?”
“हां क्यों नहीं, दरअसल कुतुबमिनार में एक ऐब है उसे ही उर्दू में कुतुबुद्दीन ऐबक कहते हैं।”
“खुदा खैर करे, अबे यही पढ़ते हो तुम ?”- “यही जानकारी रखकर पत्रकार बनोगे?”- जमील चचा आग बबूला होते हुए बिसंभर शर्मा पर चढ़ गए।
“चचा किस दौर की बात कर रहे हो”- गुटखा फाड़के मुंह में झाड़ते बिसंभर बोले
“अरे पढ़ना लिखना पहले हुआ करता था आज का युग सूचना क्रांति का युग है। इंटरनेट में गूगल गुरू बइठे हैं, टन्न से टाइप करो अउर दन्न से जानकारी मिलैगी फ्री फंड में। आपकी सलाह की तरह”
“बेटा बिसंभर तुम तो खरपत्तू साव के बगल में गर्मी में बर्फ का गोला और जाड़े में गर्म छोला की दुकान खोल लो, कसम से बता रहे हैं बहुत कमाई होगी पत्रकारिता-वत्रकारिता तुम्हारे बस की बात नहीं है।”- चाय की खाली गिलास मेज पर रखते जमील चाचा बोले।
जमील चाचा की बात बिसंभर को लग गई। बिसंभर ने चचा को हाथ से रुकने का इशारा किया, चाय की दुकान के बाहर जाकर दो-चार किलो गुटखा थूका और फिर हाजिर हुए। बोले- “चचा हम तो एक सेर पर यकीन करते हैं”-
“खुदही को करो इतना बुलंद कि खुदा खुदै आकर पूछे बताऔ राजा क्या है।”
चचा इस बार अपनी हंसी रोक नहीं पाए और ठठा कर हंसने लगे।
“बिसंभर शेर तुम्हारा है क्या बे?”
“क्या चचा आप भी हिंया तो मत खिचिंए कहां हम ‘क्रिमिनल पत्रकारिता’ के ख्वाब वाले लोग” मेज पर कुहनी टिकाते बिसंभर आगे बोले- “देखिए चचा हमको बनना है ‘क्रिमिनल रिपोर्टर’ ”
“क्रिमिनल रिपोर्टर कि क्राइम रिपोर्टर बे?” टोकते हुए चचा ने पूछा।
“हां हां वही।” – बिसंभर खिझियाते हुए बोले
“अब देखिए पत्रकारिता पेन घिसने और इतिहास रटनेवाली रही नहीं अब बस वर्तमान समझिए काम हो गया” – दो कप चाय का इशारा करते बिसंभर आगे बोलते गए।
“क्राइम रिपोर्टिंग में तो बस आपको एक माइक पकड़ना है चैनल का...और मौका-ए-वारदात पर दनदनाते हुए पहुंच जाना है।...और बस सवाल खड़े करने शुरू कर देने हैं।” – बिसंभर कंधा उचकाते बोले
“अबे सवाल न हुआ खटिया हो गई” – चचा तुनकते हुए बोले “पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो सवाल क्या खाक पूछोगे?”
"आपकी सुई भी चचा घूम फिर कर वहीं अटक जाती है, पढ़ाई...हूं।“
“घटना कोई हो सवाल तो वही रहते हैं न?”
“जैसे?” – चचा ने सवाल पूछा
“जैसे कि पुलिस क्या कर रही थी…”
“प्रशासन कहां सोया था…”
“आखिर कब पुलिस जागेगी…”
“क्या पुलिस के पास जवाब है... वगैरह...वगैरह...।” –बिसंभर एक सांस में बोलते गए।
चाय आ गई थी, बिसंभर पर नज़रे गड़ाए जमील चाचा ने एक घूंट हलक के नीचे उतारा। बिसंभर को चाय से मतलब नहीं था वो बोल रहे थे-
“चचा देखिएगा दरोगा से लेके पुलिस का बड़ा से बड़ा अधिकारी हमारी जेब में होगा। आप कहेंगे एसपी से मिलना है...हम खलीता में हाथ डाल के निकालेंगे अउर बोलेंगे इ लौ...मिल लौ...”
बिसंभर को समझाना बेकार था। चचा ने फटाफट चाय खतम की और बिसंभर के कंधे का सहारा लेकर उठते हुए बोले- “गुरू हम निकलेंगे अब दफ्तर जाना है।” बिसंभर को लगा चचा कनविंस हो गए, बड़े अदब के साथ प्रणाम किया और बाहर तक उनके साथ निकले भी। सीढ़ियां उतर कर जमील चाचा थोड़ा रुके फिर बिसंभर की तरफ घूमते हुए बोले- “गुरू एक बात बताओ जिस दिन गूगल गुरू गड़बड़ा गए...या अटक गए तब क्या होगा अखबार न निकलेगा, टीवी पर न्यूज़ न चलेगी तब कौन बताएगा इतिहास?”
बिसंभर को बात न समझ आनी थी न आई। पत्रकारिता का कोर्स पूरा करते ही इंटर्नशिप का मौका भी आया। बिसंभर जुगाड़ू प्रवृत्ति के थे सो जुगाड़ ने काम किया और एक चैनल में हो गए इंटर्न। छह पॉकेट का पैंट और आठ पकेटिया हाफ जैकेट झाड़े बिसंभर यहां से वहां दौड़ते, ये बाइट वो पैकेज करते समय बीत रहा था। मन में तरंग उठती माइक, कैमरा...कभी-कभी खुदै एक्शन बोल के चालू हो जाते गलियारे में। जब कोई प्रोड्यूसर उन्हे बाइट या पैकेज कटवाने के लिए देता तो तन-बदन में आग लग जाती। कब्ज़नुमा मुंह बना लेते। मन ही मन बोलते “कमबख्त मेरी क्रिमिनल योग्यता को ये परख ही नहीं रहा।”
कभी-कभी तो मन इतना बहकता कि लगता खड़े हो जाएं न्यूज़ रूम में और चीखने लगें-
“पुलिस क्या कर रही थी…”
“प्रशासन कहां सोया था…”
“आखिर कब पुलिस जागेगी…”
“क्या पुलिस के पास जवाब है...
कुल मिलकार कसमसाते काम चल रहा था। दीन दुनिया से बेपरवाह, खबर देखते न खबर समझते, बस हिंया बैठते...कोई उठा देता तो हुंआ चले जाते....।
जुगाड़ यहां भी खोज ही रहे थे कि सही साट कोई मिले और क्राइम की दुनिया में वो कदम रख ही लें। इस बीच फुटकर काम निपटाते रहे। गूगल को वो बड़े काम की चीज़ मानते उनकी नज़र में अकेला वही था जो ज्ञानी था। बाकि उनकी नज़र में अज्ञानी और पुरानी मीडिया के कलम घिस्सू पत्रकार थे। हां एंकर उनकी नज़र में गूगल के बाद दूसरा ज्ञानी था। और उनके मुताबिक उत्तर आधुनिक मीडिया का प्राणी था। पर एक दिन एक घटना घटी-
हुआ ये कि एक प्रोड्यूसर ने उन्हे गांधी जी की तस्वीर निकालने को कहा। इस काम में तो गुरू माहिर थे। टप से गूगल खोला और टाइप कर दिया गांधी...। पर इस बार गूगल गुरू ने गच्चा दे दिया। गांधी टाइप करते ही जितने गांधी उपनाम वाले लोगों की फोटो गूगल गुरू की स्मृति में अंकित थी सभी स्क्रीन पर अवतरित हो गए और लगे मुस्कुराने। बिसंभर परेशान, बेड़ा गर्क इतने गांधी किसको निकालें। सोचा एक्कड़-बक्कड़ करके चुन लें...पर उसमें भी तो समय लगता पचासों फोटो थी।
समझ नहीं आ रहा था कि किसे मौका-ए-वारदात पर शिनाख्त के लिए बुलाएं। आखिरकार थक हारकर प्रोड्यूसर को ही आवाज़ दी। प्रोड्यूसर आए तो समस्या रखी- “सर, यहां तो कई गांधी दिख रहे हैं इसमें से गांधी जी कौन है?”
प्रोड्यूसर को लगा कि वो मज़ाक कर रह हैं। खीझते हुए बोला- “मज़ाक मत कर जल्दी ‘सेव’ कर पैकेज में लगाना है”
“अरे सर, मुझे सच में नहीं मालूम”
“तू गांधी को नहीं पहचानता”- इस बार प्रोड्यूसर का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
प्रोड्यूसर के लहज़े से खिन्न बिसंभर जी कंधा उचकाते बोले- “कोई ज़रूरी नहीं कि हर व्यक्ति हर किसी को जानता हो”
प्रोड्यूसर महोदय हत्थे से उखड़ रहे थे, उन्होने एक तस्वीर को क्लिक किया और खट से एक तस्वीर स्क्रीन पर आई। इस तस्वीर में गांधी और नेहरू एक साथ बैठे थे। उन्होने बिसंभर से पूछा – “इस तस्वीर में कौन-कौन है?”
बिसंभर को ये सवाल थोड़ा आसान लगा जवाब दिया- “ये एक नेता हैं और उनके साथ कोई गांववाला बैठा है।”
प्रोड्यूसर साहब सर पीटते हुए भाग खड़े हुए। जब लौटे तो उनके साथ इनपुट संपादक तिवारी जी थे। कौन है, कहां है कैसा है...छोटे वाक्यों के साथ उनकी आमद हुई। जैसे ‘एलियन’ पकड़ में आ गया हो। बिसंभर हाथ छाती से बांधे, सीना फुलाए खड़े थे।
“क्यों बे तुम गांधी जी को नहीं जानते? ” - तिवारी जी ने आते ही सवाल दागा।
“एक होते तो जान लेता हियां खचिंया भर पड़े हैं। ” बिसंभर हास्यरस के पुट में बोले।
अब तक तिवारी जी बिसंभर गुरू का टेस्ट लेने पर आमादा हो चुके थे। पूछा- “ इ बताओ भारत का प्रधानमंत्री कौन है?”
“सरदार हैं कोई” – कॉन्फिडेंस से लबरेज बिसंभर बोले।
“कौन प्रकाश सिंह बादल?” – तिवारी जी ने पूछा।
"जी,...बा..द..ल...हां हां वहीं आसमानी रंग की पगड़ी बांधे जो रहते हैं” – बिसंभर बोले
न्यूज़ रूम में खुसुर-फुसुर शुरू हो चुकी थी। कुछ इंटर्न नेट खोलकर भारत के राष्ट्रपति से लेकर, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, मुख्य न्यायाधीश आदि आदि तक का रट्टा मारना शुरू कर चुके थे। पाया गया कि कुछ प्रोड्यूसर स्तर के लोग भी कनखियों से स्क्रीन टीप रहे थे।
जो गांधी को जानते थे वो असाधारण टाइप साधारण मुंह बनाते बोलते फिर रहे थे, बताइए गांधी जो को नहीं जानते, चले हैं पत्रकारिता करने। क्या हल्की जेनेरेशन आ गई है। कुछ तो गांधी जी के साथ आई दूसरी फोटो का उंचे सुर में नाम ले ले कर प्रशंसाभिलाषि हुए जा रहा थे। कुछ ने तो आपस में गांधी की आत्म कथा की समीक्षा और गांधीवाद पर गंभीर विमर्श तक शुरू कर दिया था।
लेकिन तिवारी जी भरे हुए थे। गोरा चेहरा तवे की तरह तमतमा रहा था उसपर से लाल रंग की टीशर्ट तवे को लहका रही थी। बिसंभर स्थितिप्रज्ञ थे। उनको अभी भी लग रहा था कि भइया गांधी क्या कहीं के डीएसपी हैं या एसपी हैं कि हमारा जानना ज़रूरी है।
और हैं तो हों, एक बार ‘क्रिमिनल रिपोर्टर’ बन गए तो वो रहेंगे तो खलीते में?
लेकिन तिवारी जी सामान्य ज्ञान परीक्षण से बाज आनेवाले नहीं थे। सवाल दागा- “वित्त मंत्री क्या होता है?”
“वृत्त मंत्री यानि सर्किल अफसर।” - इस बार बिना देर किए बिसंभर ने जवाब दिया था।
“रक्षामंत्री कौन है देश का?”- तिवारी जी खीझते हुए तेज़ आवाज़ में बोले।
“बजरंग बली”
“तुम मज़ाक कर रहे हो?” तिवारी जी ने चैतन्य बिसंभर जी की आंखों में आखें गड़ाते पूछा।
“मज़ाक?... मज़ाक तो आप कर रहे हैं। मेरा ‘एरिया ऑफ इंटरेस्ट क्राइम’ है और आपने मुझे ‘पॉलिटिक्स’ में उलझा दिया है।”
बिसंभर बोलते गए- "सर, क्राइम में सवाल का जवाब थोड़े ही देना होता है, वहां तो सवाल उठाना होता है।”
“पुलिस क्या कर रही थी…”
“प्रशासन कहां सोया था…”
“आखिर कब पुलिस जागेगी…”
“क्या पुलिस के पास जवाब है...
“एसी साहब जवाब दिजिए”
“डीजीपी साहब जवाब दिजिए”
बिसंभर नॉन स्टॉप बोलते गए। आखिरकार मन की मुराद पूरी हो गई थी। उन्हे अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल ही गया था। लोग सन्न रह गए न्यूज़ रूम में ‘पिन-ड्रॉप’ ‘साइलेंस’ हो गया। तिवारी जी की जनरल नॉलेज परीक्षण शिविर में सवालों की आमद अचानक रुक गई थी। वो भौचक थे...भौचक तिवारी जी की तंद्रा अचानक टूटी। उन्होने बिसंभर जी के कंधे पर हाथ रखा...दूसरे हाथ से उनके बैग को उठाया...और बाहर गेट तक ले आए...। बड़े शांत भाव से बिसंभर जी को समझाया-“भाई मेरे, भगवान के लिए पत्रकारिता को बख्श दें। पहला क्राइम आपने पत्रकारिता में हाथ आजमाने का फैसला लेकर ही कर दिया अब मामले को यही रफा-दफा करें, इसमें बने रहने का दूसरा बड़ा क्राइम न करें कृपा होगी। अलविदा।”...लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, कालांतर में बिसंभर शर्मा कई-कई न्यूज़ चैनलों में जुगाड़ पद्धति और चापलूसी मंत्र के ज़रिए उच्च पदों तक पर शोभायमान हुए। लोग उनके बारे में बतियाते कि उन्हे ‘चापलूसी सिद्ध’ थी। गांधी को न जानने वाले बिसंभर के ऊपर गांधी बाबा की कृपा अनवरत बनी रही वो अक्सर उनकी जेब में ठुंसे पाए जाते। जैसे-जैसे समय बीतता गया शर्मा जी ‘दलाली संहिता’ के आचार्य होने के साथ आगे चलकर ‘विद्यावाचस्पति’ भी हुए।