Wednesday, April 1, 2015

वो 'कलफ़दार पर्सनॉलिटी'


वो अक्सर मिलते हैं। मुस्कुराते हैं हौले से पूछते हैं- और कैसे हैं? फिर निकल जाते हैं। बिना ये सुने कि सामने वाले ने जवाब क्या दिया। औपचारिकताओं में उलझना कीमती समय को खर्च करने से बचाना होता है। समय कीमती हैं। वो हमेशा समय के साथ चलते हैं। समय किसी के लिए नहीं रुकता...वो भी नहीं रुकते। समयानुकूल संवाद बनाना स्मार्टनेस की निशानी है। लिहाज़ा वो संवाद बनाते हैं।
आज वो बब्बन की दुकान पर बेसन लेने पहुंचे तो तबीयत से गीले थे। आसमान में अचानक बादल आए थे ठीक उसी तरह वो भी आ धमके थे। मैं बब्बन की दुकान पर सत्तू की पतासाजी के लिए गया था। दिल्ली में सत्तू की खोज निरर्थक नहीं है। ये सिद्धि जैसी है। शुद्ध मिल जाए तो समझ लीजिए डबल सिद्धी। खैर...। वो बेसन की खोज में अवतरित हुए। मिले...तो मुस्कुराए...। और पूछा- कैसे हैं? मैंने जवाब दिया- अच्छा हूं आप बताएं...। उन्होने फिर नहीं सुना और बब्बन से बेसन का भाव पूछकर किलो भर देने को कहा। इसके बाद फिर मुझे देखा...मुस्कुराए...और बोले- और बताइए...। मैने जवाब दिया- जी ठीक है आप कहें...कैसा चल रहा है...। वो फिर मेरे सवाल को अनसुना कर बब्बन को पैसे देने लग गए।

दरअसल बड़े लोग सिर्फ सवाल पूछते हैं। जवाब देने या सुनने का उनके पास वक्त नहीं होता। देश में एक शगल सा चल निकला है। ऐसे प्रतिभावान लोगों का अपना गिरोह है। मैं उन्हे तब से जानता हूं जब वो कॉलेज में थे। उनके कुर्ते में लगी कलफ़ उनके शरीर में समाकर उनके गले और ज़ुबां तक पर चढ़ गई है। उनका बदन हमेशा अकड़ा रहता है। मुंह आगे से उठा हुआ...नाक न जाने क्या सूंघने पर आमादा रहती है। वो जब भी मिलते हैं हाथ मिलाते हैं...उनकी ग्रिप मजबूत होती है। वो अंदर से बाहर तक पॉजिटिव हैं। बाज़ार में पॉजिटिविटी की डिमांड है। बाज़ार में थिंक पॉज़िटिव के नाम से न जाने कितनी किताबें उतरीं और चल निकलीं। ये अलग बात है मैं उन किताबों को पढ़कर भी बाज़ार के हिसाब से कलफ़दार न बन पाया।

मैं जब उन्हे देखता हूं तो जोश से भर जाता हूं। कोशिश करता हूं कि रिक्शेवाले को - चल बे कहकर बात करूं। किसी छोटे को - तू तड़ाक करके बात करूं...। थोड़ी सी चूक होने पर सामने वाले का पानी उतार कर रख दूं। पर न जाने क्या है जो रोक देता है। कलफ़दार कुर्ते का फर्क तो पड़ता है। कॉलेज टाइम में कलफ़दार कुर्ता पहना होता तो शायद बात कुछ और हो सकती थी। काश कि शिक्षकों को श्रद्धा भाव से देखने की बजाए अद्धा (क्योंकि वो अक्सर ये बताते थे कि किन-किन प्रोफसरों को अद्धा पहुंचाते रहे) भाव से देखा होता। वो बेसन लेकर मेरे सामने से निकल रहे हैं।
अचानक हाथ कंधे पर पड़ता है। वो कहते हैं- चलो दोस्त निकलते हैं। मैं शेक हैंड करने के लिए हाथ बढ़ाता हूं...और वो कंधे को दबाते निकल जाते हैं ये कहते- मिलते हैं...। मेरी दबी ज़ुबां से शब्द निकलता है- कब...? ये अनुत्तरित रह जाता है हमेशा की तरह...। बड़े लोग सवालों के जवाब नहीं देते।

2 comments:

  1. बहुत ख़ूब... सर...

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  2. Kya bat hai sir....nostalgia se bahar aayenge...

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